करूणा पर लागू नहीं होते कारण और सामाजिक तर्क

हृदयनारायण दीक्षित

संवेदन प्रकृति की आत्मीयता का उपहार है। यों आत्मीयता उल्लास प्रसाद देती है लेकिन बहुधा व्यथित भी करती है। व्यथित चित्त के संवेदन का नाम है करूणा। करूणा का गाढ़ापन हमारी संवेदनशीलता का अनुषंगी है। भारतीय चिन्तन में परमसत्ता को ‘करूणावतार’ कहा गया है। करूणा अपनी संपूर्णता में स्वयं को अस्तित्व के साथ विलय कर देती है। संभवतः। करूणा गहन भाव है। प्रकृति के सभी गोचर प्रपंचों का कोई न कोई कारण होता है लेकिन करूणा का प्रत्यक्ष कारण गणित या विज्ञान के नियमों की तरह अकाट्य नहीं होता। पेड़ काटा जाता देखकर किसी के चित्त में करूणा का गहन ज्वार उमड़ सकता है तो बहुत सारे लोगों के लिए पेड़ कटाई करूणा का कारण नहीं बनती। मैं अपनी अनुभूति साझा कर लूं। मुझे पेड़ कटते देखकर दुख होता है। पेड़ काटने वाले पर गुस्सा आता है। मैं उसके विरूद्ध होता हूं। उसी समय उसकी पिटाई देखकर मैं उसके प्रति भी करूण हो जाता हूं। चोर टेम्पो या बस से माल लेकर भागते हैं। पीडि़त को रोते देखकर व्यथित होता हूं लेकिन चोर पकड़ा जाता है, उसकी पिटाई होती है। मैं उसकी पिटाई में भी आहत होता हूं।
कारण और सामाजिक तर्क करूणा पर लागू नहीं होते। जहां दुख संवेदना और जहां सह-अनुभूति वहां-वहां करूणा। करूणा का कारण पता नहीं चलता। उसका उद्गम, प्रसाद और कार्यक्षेत्र हमारा अन्तस् है। हमारा अन्तस् भले ही व्यक्तिगत इकाई हो लेकिन करूणा प्रकृति प्रीति का ही विस्तार है। पशु वधशालाओं में निर्दोष पशुओं की रक्तधारा है। सड़क के किनारे भी बकरी और चिडि़या को काटते और फड़फड़ाते देखकर असह्य शोकग्रस्त होता हूं। हमारे जेसे व्यथित चित्त आहत होते हैं। संसार का कार्यव्यापार तो भी चलता है। करूणा रूलाती है। आंसू झरते हैं। अश्रु प्रवाह को निर्भार करना चाहिए। लेकिन करूणा के भार को आंसू भी निर्भार नहीं कर पाते। ऐसे लोगों को पिटते देखकर भी करूणा जागती है। नियम, विधिव्यवस्था और न्याय का तराजू एक तरफ हमारी करूणा का भार अलग और सब पर भारी। विधि व्यवस्था हमारी गढ़ी है। हम न्याय की अवधारणा सभ्य मनुष्यों ने ही गढ़ी है लेकिन करूणा हमारा चयन नहीं। हमारी योजना का परिणाम नहीं। संस्कृति या सभ्यता की देन भी नहीं।
मन बार-बार करूणा की ओर जाता है। तर्क से करूण-तत्व खुलता नहीं। वह और भी बदन संकोची हो जाता हैं कौन भेजता है हमारे अन्तस् में करूणा का महानद्। आकाश का अन्त नहीं। अग्नि सर्वत्र व्यापी। हरेक भूत में उपस्थित। जल धरती में प्रवाहित हैं। अग्नि वायु उन्हें उड़ाकर आकाश ले जाते हैं। वे फिर-फिर लौटते हैं पृथ्वी की ओर। लेकिन करूणा की काया का रसायन पकड़ में नहीं आता। कितना रोया धोया जाय? और कब तक? दुख संवेदन की आंधी थमती नहीं। तो क्या करूणा पंच महाभूतों क्षिति, जल, पावक, गगन, समीर के अलावा कोई अन्य तत्व है या इन्हीं के मिलन और प्रीतिरस का परिणाम? मानते हैं कि व्यथा संसार का अविभाज्य हिस्सा है। लेकिन प्रकृति की मूल प्रकृति सृजनधर्मा है। तो क्या करूणा भी प्रकृति का ही सृजन है? संभव है कि ऐसा ही हो लेकिन प्रश्नों का क्या? प्रश्न हमारी चिंतन परंपरा के शक्तिशाली योद्धा हैं। प्रश्न करता हूं कि प्रकृति ने ही करूणा गढ़ी हो तो हरेक व्यक्ति को एक समान करूणा बांटने में भेदभाव क्यों? कोई करूणा से भरापूरा तो कोई नितांत रूखा रेगिस्तान जैसे हृदय वाला।
हमारे भाग और भाग्य में करूणा ही करूणा क्यों है। हमारी करूण समृद्धि ईर्ष्या करने योग्य है। ऋग्वेद के ऋषियों ने तमाम “भावों” की स्तुति की है – श्रद्धा भाव ही है लेकिन ऋग्वेद के ऋषियों ने उन्हें देवता जाना है। वैदिक पूर्वजों ने गरीबी और अभाव को भी देवता कहा है। स्तुति है कि कृपा करें, हमारे पास न आएं। मेरे लेखे करूणा भी देवता है। सो सबके हृदय में होंगे ही। संभव है कि किसी हृदय में सुप्त हों और किसी हृदय में जागृत। करूणा रिक्त हृदय नहीं होना चाहिए। सारे हृदय और अंतः क्षेत्र प्रकृति के भाग हैं। सो सबके सब करूणरस से युक्त होंगे ही। हमारी काया में अनेक गं्रथियां हैं। वे आवश्यकतानुसार रस देती हैं। पैंक्रियाज सुपरिचित है। ठीक काम करती है तो इंसुलिन देती है। ठीक काम नहीं करती, इंसुलिन नहीं देती तो मधुमेह। शारीरिक लम्बाई के लिए पिट्यूटरी ग्रंथि के रस-हार्मोन को जिम्मेदार बताया गया है। बहुत संभव है कि हम सबके भीतर करूणा रस या हार्मोन की भी कोई ग्रंथि हो। विज्ञान को अभी पता नहीं। संभव है कि विज्ञान आगे कभी पता कर ले। तब बाजारू इंसुलिन की तरह करूण रस का भी उत्पादन संभव होगा। करूण रस सहानुभूति और संवेदन का नवचेतन होगा। संसार कितना खूबसूरत होगा तब? करूण भाव की समृद्धि देखकर वरूण देव भी आश्वस्त होंगे। संसार को व्यवस्था में रखने का काम उन्हीं का है।
करूणा का अभाव करूणा का ही विषय है। हिंसा, क्रोध, उत्पात और शोषण करूणा के अभाव में ही शक्ति संपन्न होते हैं। करूण व्यक्ति आक्रामक नहीं हो सकता और न ही शोषक। वह हिंसा नहीं कर सकता। समाज या राजव्यवस्था के भय से नहीं। करूणा से भरपूर चित्त संपूर्ण अहिंसक ही होगा। अहिंसा उसका सिद्धांत नहीं होगी। अहिंसा हिंसा का नकार नहीं है। अहिंसा विधेय है। करूणा का प्रकट भाग। शब्द गठन की विवशता है। इसीलिए हिंसा मूल शब्द जान पड़ता है और नकार ‘अ’ लगाकर बना अहिंसा उसका विरोधी। सच बात यह है कि अहिंसा मूल चेतन है। प्रकृति अपने हरेक रूप, रंग और अभिव्यक्ति का संवर्द्धन चाहती है। मनुष्य चेतन, चिन्तनशील और बुद्धि प्रवण प्राणी है। उसके चित्त की करूणा प्रायोजित नहीं स्वाभाविक ही है। अहिंसा करूणा की वाह्य अभिव्यक्ति है। करूणा मूल है, प्रीति, आत्मीयता और सौहार्द इसी मूल के वृक्ष, फूल फल। जहां जहां आत्मीयता वहां वहां करूणा।
प्रकृति की सभी शक्तियां करूणा से भरी पूरी। करूणा से भरपूर सूर्य समूचे विश्व को ऊर्जा देते हैं। तारागण और ग्रह नक्षत्र हरेक क्षण अपनी करूणा में गतिशील हैं और मेघ, नदियां, वनस्पतियां भी। अस्तित्व की जिजीवीषा और पुनर्सृजन की प्रकृति के मूल में करूणा है। हम मनुष्य इसी अस्तित्व का अंग हैं। अस्तित्व के अंगभूत ही। करूणा भी अस्तित्वगत है। यह कोई जीवनमूल्य नहीं। पंथिक या मजहबी आस्था विश्वास नहीं। लेकिन इसके प्रवाह में विश्व आत्म को रूपांतरित करने की शक्ति है। संरक्षित, संवर्द्धित और बार-बार पालित पोषित किए जाने योग्य है करूणा। हमारी देव प्रतीति ‘करूणानिधान’ है। करूणा श्रद्धेय है और बारंबार नमस्कारों के योग्य।

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