बढ़ी है कांग्रेस की वेदना

डा. दिलीप अग्निहोत्री

विदेश यात्रा से वापस लौटने के बाद राहुल गांधी पुनः अज्ञातवास के बाद कुछ नया देखना चाहते थे, उन्हे निराशा हुई। संयोग से स्वदेश लौटने के बाद उन्हें एक बड़े सम्मेलन का समापन करना पड़ा। पहले यह कार्य कांग्रस अध्यक्ष सोनिया गांधी को करना था, लेकिन अब यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है कि वह अपनी भूमिका सीमित कर रही हैं। राहुल को वह सभी अवसर दे रही हैं जिनकी अपेक्षा राष्ट्रीय अध्यक्ष से होती है। सम्मेलन का नाम भी कम दिलचस्प नहीं था। इस जन वेदना नाम दिया गया था। इस नामकरण से यह दिखाने का प्रयास हुआ कि देश आमजन मे वेदना है यह वेदना ढाई वर्षों से उत्पन्न हुई है। पहले देश में मकं सर्वत्र आनंद का वातावरण था कांग्रेस के पास इस शब्द का जवाब नहीं है कि इसके शासन इतना ही आनंद था किसी प्रकार की वेदना नहीं थी। तब उसे चुनौती वेदना क्यों झेलनी पड़ी। राहुल ने अज्ञातवास में कितना चिंतन किया वही जाने, लेकिन यहा भी उनके लिए आत्मचिंतन का विषय नहीं है। उन्हे चिंतन करना चाहिये कि नोट बंदी पर जमीन आसमान एक करने के बावजूद उन्हे जनसमर्थन क्यों नहीं मिला, क्या कारण है कि पंजाब में कैप्टन अमरिन्दर और उत्तराखंड में हरीश रावत उनकी ज्यादा सक्रियता नहीं चाहते है। ये दोनों कांग्रेसी राहुल की सक्रियता में पार्टी का नुकसान क्यों देख रहे हैं। पिछले विधान सभा चुनाव में उन्होंने अपनी प्रतिष्ठा दांव पर लगा दी थी। वह सपा के युवराज बने अखिलेश यादव की साइकिल रोकना चाहते थे। सपा का चुनाव घोषण पत्र उन्होंने सार्वजनिक सभा में फाड़ कर फेंका था। आज कांग्रेस किस मुकाम पर है क्या वह अकेले चुनाव में उतरने का साहस दिखा रही है क्या कारण है कि पीके का पूरा संगठन अघोषित रुप से सौंपने के बावजूद कांग्रेस को कुछ हासिल नहीं हुआ। क्या कारण है पीके की सलाह पर पूरी तरह अमल करने के बावजूद राहुल गांधी अपनी छवि सुधार नहीं सके, क्या कारण है कि कई महीनों की कवायद के बवाजूद उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का ग्राफ नहीं बढ़ा। गनीमत है कि राहुग गांधी विधान सभा चुनवों से पहले विदेशी अज्ञातवास से वापस आ गए। बताया जा रहा है कि उनके राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने की औपचारिक घोषणा कभी भी हो सकती है। ये बात अलग है कि इस ताजपोशी की अटकले पिछले कई वर्षों से लग रही है। वैसे परिवार आधारित पार्टियों में शीर्ष पद का निर्धारण प्रायः औपचारिकता होती है। कि जब-जब राहुल को अध्यक्ष बनाने की उल्टी गिनती शुरु होती है वह न जाने किस देश में बिना बताये चले जाते है। यह एक संयोग मात्र हो सकता है, लेकिन इसे लेकर चर्चा अवश्य शुरु हो जाती है। इस रहस्य को सुलझाने का प्रयास होता है, लेकिन हर बार नाकामी हासिल होती है। इस बार राहुल को गोपनीय विदेश यात्रा अधिक चौकाने वाली थी। क्योंकि नोटबंदी पर भरपूर हंगामा और बयानबाजी के बाद देश में प्रदर्शन की योजना राहुल गांधी ने ही बनायी थी। यह माना गया है कि वह खुद इसमें भागेदारी करंेगे। नोटबंदी उनकी विपक्षी राजनिति का सबसे प्रिय विषय बन गया था। लेकिन वह प्रदर्शन के ऐलान के फौरन बाद वह बिना बताये यात्रा पर चले गये। इसमें दूसरी चौकाने वाली बात विधानसभा चुनावों के समय संबंधित थी। पांच राज्यो के विधान सभा चुनाव की प्रक्रिया महत्वपूर्ण दौर में है अधि सूचना जारी चुकी थी प्रत्याशी चयन का कार्य अंतिम चरण मंे था। पंजाब में घोषण पत्र जारी होना था, लेकिन राहुल गांधी विदेश में थे। घोषणा पत्र पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह व कैप्टन अमरिंदर सिंह ने जारी किया। अमरिंदर की बात तो सही थी। लकिन इसमें मनमोहन सिंह को शामिल करने से कांग्रेसी भी हैरत में थे। पिछला लोकसभा चुनाव मनमोहन व राहुल के नेतृत्व में हुआ था। कांग्रेस 44 सीटों पर सिमट गई थी। इसके अलावा सिक्ख होने के बावजूद मनमोहन का पंजाब की राजनीति में कभी कोई महत्व नहीं रहा। ऐसे में राहुल का इस अवसर से अलग रहा अप्रत्याश्ति नही था, लेकिन मनमोहन की मौजूदगी इनती ही अप्रत्याश्ति थी। बताया जा रहा है कि अमरिन्दर सिंह अपनी मर्जी से पंजाब चुनाव का संचालन कर रहे है। उन्होंने पहले ही यह कह दिया था कि राहुल गांधी पंजाब में ज्यादा हस्तक्षेप न करे। वह जितने सक्रिय हांेगे पार्टी को उतना ही नुकसान होगा। मनमोहन सिंह को प्रतीक रुप में शामिल किया गया। उसी सोच के अनुसार जिससे सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री बनाया था। इसके बाद राहुल गांधी को अपने विषय में कोई गलत फहमी नहीं होनी चाहिये। कांग्रेस के भीतर ही लोग उनकी न्यूनतम सक्रियता चाहते है। पंजाब के पहले यही नजारा बिहार में देखने को मिला था। तब कांग्रेस के अलावा राजद और जटायू के नेताओ ने पहले ही बता दिया था कि राहुल की ज्यादा सक्रियता उन्हें मंजूर नही होगी। लालू यादव व नीतीश कुमार राहुल के साथ ही मंच साझा किया करने में भी दिलचस्पी नहीं दिखायी थी। राहुल को समझना होगा कि घिसे पिटे और बेतुके मुद््दे उठाने से न तो उनकी छवि में सुधार हो रहा है, ना पार्टी का ग्राफ बढ़ रहा है। इसके विपरीत कांग्रेस ने क्षत्रप भी उन्हें नजरअदंाज कर रहे है। नोटबंदी पर हंगामे के बावजूद राहुल को विपक्ष ने नेता नहीं माना न ही उन्हें जन समर्थन मिला। राहुल के बातों से खुद उनके खिलाफ प्रश्न उठते है। जनवेदना सम्मेलन में उन्होंने कहा कि अच्छे दिन तब आयेंगे, जब अगले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की सरकार बनेगी। प्रश्न उठा कि क्या इसके लिए दस वर्ष कम पड़ गये थे। राहुल आज घोटाले का आरोप लगाते है इनका कोई आधार या प्रमाण नहीं देते है प्रश्न उठता है कि संप्रग घोटालों पर वह मौन क्यांे है। राहुल कांग्रेस की वापसी का मंसूबा दिखाते है, लेकिन उत्तर प्रदेश में गठबंधन के के लिए तत्पर क्यों है। ऐसे अनके प्रश्नों पर राहुल को किसी अज्ञातवास में आत्मचिंतन करना चाहिए।
(लेखक चर्चित स्तम्भकार हैं। उपर्युक्त लेख लेखक के निजी विचार हैं।)

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