अमेरिका को कहां ले जाएगी नस्लभेदी नीति



प्रभुनाथ शुक्ल

अमेरिका की सत्ता, बदलती राजनीतिक परिस्थितियां और उसकी नीतियां दुनिया को कहां ले जाएंगी यह चिंता का विषय है। डोनाल्ड टंप और उनकी सरकार की तरफ से अमेरिकी हितों की आड़ में उठाए गए कुछ फैसले प्रवासी नीति और बढ़ते पलायनवाद के लिए सबसे बड़े खतरे हैं। क्या वास्तव में डोनाल्ड सरकार को अमेरीकीहितों की खास चिंता है या फिर अतिवादी संगठन को खुश करने के लिए यह सब किया जा रहा है। ओबामा की बिदाई के बाद टंपयुग की शुरुवात के साथ बहुत कुछ बदल गया है। रंगभेद की बढ़ती घटनाएं भातीरयों को डराने लगी हैं। आठ महींनों के दौरान श्वेत अतिवादियों के हमले में कई भारतीयों की मौत हो चुकी है। सोशलमीडिया पर सुनियोजित और रणनीतिक नस्लभेदी टिप्पणियां की जारही हैं। इससे साफ होता है की एक अतिवादी विचारधारा का प्रभाव तेजी से बढ़ने लगा है। जिसमें भाषा, नस्ल और रंगीभेद की नीति पल्लवित होती दिखती है। सात मुस्लिम देशों के शरणार्थियों पर लगाया गया प्रतिबंध टंपयुग का पहला कदम था जिसमें श्वेतकारी संगठनों की जीत हुई हलांकि संघीय अदालत ने इसे समता, समानता और मानवाधिकार के खिलाफ मानते हुए प्रतिबंधित कर दिया। जबकि सरकार का तर्क यह था की अमेरिकी नागरिकों और उसकी आतंरिक सुरक्षा को देखते हुए इस तरह का कदम उठाया गया। दुनिया और भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता का कारण एच-1 बी वीजा नीति है। जिसे लेकर आईटी कंपनियों की चिंता बढ़ गयी है। कनसांस में भारतीय मूल के इंजीनियर श्रीनिवास की हत्या के बाद प्रवासी डरे और सहमें हैं। यहां सबसे अधिक दक्षिण भारत के लोग हैं। इस नस्लभेदी हमले के बाद तेलंगाना अमेरिकन तेलुगु एसोसिएशन ने सार्वजनिक स्थानों पर लोगों से हिंदी में बात करने और अमेरीकियों से संवाद स्थापित करने से मना किया है। नस्लीय समस्या सबसे अधिक हैं वहां हैं जिन इलाकों से टंप को भारी जीत मिली है। वैसे चुनावों के दौरान ही आतंकवाद की आड में मुस्लिमों पर बोले गए डोनाल्ड के बयान से ही स्थिति साफ हो गई थी की टंप की नीतियां आक्रामक और उसकाउ हैं। इससे अमेरिका में रंगभेदी नीति हावी पड़ सकती है जिसकी शुरुवात हो गयी है। श्वेत प्रभुसत्तावादी यह नीति कहां ले जाएगी चिंता और चिंतन का विषय है। हलांकि मुस्लिम शरणार्थियों पर लगाए गए प्रतिबंध के बाद टंप सरकार हासिए पर आ गई। बौद्धिक और मानवाधिकारवादी संस्थाओं से उसे काफी विरोध झेलना पड़ा। अमेरीकी कार्रवाई के बाद कई मुस्लिम देशों ने भी अमेरीका पर प्रतिबंध लगा दिया। अल्पसंख्यक समुदाय इस घटना के बाद बेहद खौफ जदा है। हत्या करने वाला एडम पुरिंटन कह रहा था कि वह दो मुसलमानों को गोली मारी है। इससे यह साफ जाहिर होता है कि अमेरिका नस्ली हिंसा की तरफ तेजी से बढ़ रहा है। चेहरे और बोली भाषा के अधार पर भातरवंशियों को निशाना बनया जा रहा है। अमेरिका में यह कोई पहली बार नहीं हुआ है। लेकिन टंपयुग में रंगभेद पर नफरत बढ़ी है। हलांकि अमेरिकी जांच एजेंसी एफबीआई ने हत्या के कारणों की जांच शुरु कर दी है। एजेंसी कई नजरिए से इसकी जांच कर रही है जिसमें नस्लभेदी मानकिसता मुख्य है। भारत सरकार ने इस पर कड़ा प्रतिरोध भी जताया है। लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं है की अमेरिका में आए बदलाव और डोनाल्ड नीतियों की वजह से यह सब हो रहा है। अमेरिकी चुनावों के दौरान ही साफ हो गया था कि यह सरकार इस्लामिक आतंकवाद के खिलाफ है। इस पर भारत को शकून मिला था, लेकिन अब उसकी तस्वीर साफ होने लगी है। इस्लामिक आतंकवाद से पीड़ित देशों से पीड़ित मुस्लिम शरणार्थियों के लिए टंप का फैसला भी उनकी रणनीति का हिस्सा था जिस पर उन्हें मुंह की खानी पड़ी।
अमेरिकी सरकार का यह फैसला मुस्लिमों और अप्रवासीय लोगों के लिए सबसे बुरा साबित हुआ है। रंगभेद नीति पर अमेरिका का असली चेहरा उजागर हो गया। जिसकी वजह है की घृणित समूह अपनी गतिविधियों में सक्रीय हो गए हैं। अरकांसस, मीसीसिपी और मोंटाना में इस तरह के संगठन अपनी गतिविधियों को अंजाम देने में लगे हैं। जिनका उद्देश्य ही कथित अमेरिकीहितों का अतिवाद है। एसे संगठनों की संख्या तकरीबन 1600 से अधिक है लेकिन इसमें 900 संस्थाएं अप्रवासियों के खिलाफ हैं। भारतीयों को खुले आम अमेरिका छोड़ने की धमकी दी जा रही है। श्वेतहितों को सर्वोच्च रखने वाले ऐसी अतिवादी संस्थाओं नशाने पर अल्पसंख्यक समुदाय लोग हैं, जिनमें अप्रवासी शामिल हैं। सोशलमीडिया यानी ट्वीटर पर सबसे अधिक मुस्लिमों, अप्रवासियों और समलैंगिकों पर हमला बोला जा रहा है। वासिंगटन डीसी में फडरेशन फार अमेरिकन इमिग्रेशन रिफार्म संस्था दुनिया भर के प्रवासियों के खिलाफ मुहिम चलाती है। हलांकि टंप सरकार दुनिया भर से इस्लामिक आतंकवाद और आईएसआई के सफाए के लिए संकल्पित है। लेकिन उसकी घरेलू नीतियां इसे प्रभावित करती दिखती हैं। अमेरिका की अप्रवासी और रोजगार नीति से सबसे अधिक भारत का नुकसान होगा। क्योंकि सबसे अधिक भारतीय वहां रहते हैं। तकरीबन 30 लाख प्रवासियों में 10 लाख भारतीय हैं। जिसमें सबसे अधिक वैज्ञानिक और इंजीनियर हैं। क्योंकि आईटी कंपनियों को कम पैसे में सस्ते इंजीनियर और अच्छे वैज्ञानिक आसानी से सुलभ हो रहे हैं, जबकि अमेरिका में बेगारी बढ़ रही है। पूरे एशिया से सबसे अधिक भारतवंशी वहां रहते हैं। आंकड़ों पर गौर करें तो 10 सालों में 80 फीसदी से अधिक भारतीयों का पलायन अमेरिका में हुआ है। 16 फीसदी से अधिक प्रवासी निवास करते हैं। जिसमें आठ फीसदी इंजीनियरिंग क्षेत्र में कार्यरत हैं। उच्चशिक्षा के लिए अमेरिका जाने वाले भारतीय छात्रों में 24 फीसदी का इजाफा हुआ है। वैश्विक आंकड़ों की बात करें तो 50 फीसदी प्रवासी केवल दस देशों में बसते हैं। जिसमें अमेरिकी हिस्सेदारी 20 फीसदी है। अमेरिका में काम करने के लिए एच-1 बी वीजा दिया जाता है। टंप सरकार ने इसे अमेरिकीहितों के खिलाफ बताते हुए संशोधन की बात कहीं है। सरकार की इस नीति से भारतीय और दूसरी विदेशी कंपनियों की नींद उडा दी है। इसकी ंिचता आईटी सेक्टर में अधिक देखी जा रही है। क्योंकि अमेरिका के मुकाबले प्रवासीय इंजीनियर और वैज्ञानिक कम तनख्वाह में मिल जाते हैं, जिससे ये कंपनियां मोटी कमाई करती हैं। एच-1 बी ऐसा वीजा है जिसके लिए नियोक्ता कंपनियां अमेरिकी सरकार के इमिग्रेशन विभाग से विशेष पदों पर नियुक्ति के लिए आवेदन करती है। इस वीजा के माध्यम से अस्थाई कर्मचारियों की नियुक्ति करती हैं। यह आउटसोर्सिंग का सबसे बड़ा माध्यम है। अमेरिकी कांग्रेस ने इस तरह के हर साल 65 हजार वीजा जारी करती है। जिसका इस्तेमाल 70 फीसदी भारतीय करते हैं। 2015 तक 10 लाख से अधिक प्रवासी इस तरह के वीजे का इस्तेमाल किया। इस वीजे पर 1 लाख 30 हजार की तनख्वाह प्रस्तावित है। जबकि यह निर्धारित डालर से दो गुना है। वीजा शुल्क भी बढ़ा दिया गया है। सीधी बात है की इस नीति से अप्रवासियों का रेला कम होंगा जिससे अमेरीकियों को फायदा होगा। सिलिकान वैली जैसी कंपनी में सबसे अधिक एशियाई सीईओ हैं। यह सिर्फ भारत वंशियों की चिंता नहीं हैं दुनिया के उन मुल्कों के लिए भी गंभीर चिंतन का विषय हैं जहां से अधिक प्रवासी अमेरिका में रहते हैं। अमेरिकी हितों की आड़ में भारतवंशियों की हत्या बंद होनी चाहिए। टंप सरकार को इस्लामिक आतंकवाद और आउटसोर्सिंग को लेकर नीति साफ करनी चाहिए। भारत को इस पर अपनी नीति स्पष्ट करनी चाहिए।

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