सौर ऊर्जा उत्पादन बढ़ाने में जमीन की कमी बड़ी बाधा

मुक्ता पाटिल

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने पिछले महीने देश में सौर ऊर्जा उत्पादन को दोगुना कर 40 गीगावाट करने का फैसला लिया, जिसके लिए सरकार को 50 सौर पार्क स्थापित करने होंगे। लेकिन इस अतिरिक्त 20 गीगावाट बिजली के उत्पादन के लिए सरकार को 80,000 एकड़ (जयपुर का तीन गुना) भूमि की जरूरत होगी, जो निश्चित तौर पर इस योजना के लिए बहुत बड़ा रोड़ा साबित हो सकता है।
देश में भूमि विवादों पर नजर रखने वाली संस्था लैंड कॉनफ्लिक्ट वॉच के अनुसार, सौर ऊर्जा परियोजना के लिए पहले से घोषित तीन परियोजनाओं को लेकर विवाद चल ही रहा है। इनमें से एक परियोजना आंध्र प्रदेश के अनंतपुर में 500 मेगावाट क्षमता वाला अल्ट्रा मेगा सोलर पार्क है। इन सौर परियोजनाओं के लिए भूमि आवंटन में विलंब के चलते न सिर्फ इनकी लागत बढ़ती जा रही है, बल्कि निवेशक भी पीछे हटने लगते हैं।

सौर ऊर्जा उत्पादन में भारत की प्रगति भी सकारात्मक छवि पेश नहीं करती। मौजूदा वित्त वर्ष 2016-17 के समाप्त होने में चंद दिन रह गए हैं और सौर ऊर्जा उत्पादन का 70 फीसदी लक्ष्य अभी भी हासिल करना है, वहीं आगामी वर्षो में सौर उर्जा उत्पादन की लक्ष्य सीमा में बढ़ोतरी ही होनी है। सरकार का मौजूदा लक्ष्य 2022 तक सौर ऊर्जा के जरिए 100 गीगावाट बिजली का उत्पादन करना है, जिसका 40 फीसदी हिस्सा सोलर पार्क और अल्ट्रा मेगा सोलर पॉवर परियोजनाओं से हासिल करना है। नवीन एवं अक्षय उर्जा मंत्रालय (एमएनआरई) के अनुसार, अगर अपनी पूरी क्षमता से काम करे तो संवर्धित सौर क्षमता के जरिए हर वर्ष 64 अरब यूनिट बिजली का उत्पादन किया जा सकता है, जिससे हर साल 5.5 करोड़ टन कार्बन डाई ऑक्साइड (सीओ2) के उत्सर्जन में कटौती हो सकती है।
भारत इस समय दुनिया के सबसे बड़े गैर परंपरागत ऊर्जा कार्यक्रम पर काम कर रहा है, जिसका लक्ष्य 2022 तक गैर परंपरागत माध्यमों से 175 गीगावाट बिजली उत्पादन करना है। भारत में इस समय गैर परंपरागत माध्यमों के जरिए 50 गीगावाट बिजली का उत्पादन होता है।

सौर ऊर्जा के क्षेत्र में अभी लक्ष्य और उपलब्धि के बीच बड़ा अंतर बना हुआ है। उदाहरण के लिए 2016-17 में 12,000 मेगावाट क्षमता के सौर ऊर्जा संयत्र लगाने का लक्ष्य था, लेकिन जनवरी, 2017 तक सिर्फ 2,472 मेगावाट की परियोजनाएं स्थापित हो पाईं। देश में सौर ऊर्जा उत्पादन में सर्वाधिक योगदान रूफ टॉप सौर उर्जा (40 फीसदी) और सोलर पार्क (40 फीसदी) का है। दिल्ली स्थित अनुसंधान संस्थान ’काउंसिल ऑन एनर्जी, एन्वायरन्मेंट एंड वाटर’ (सीईईडब्ल्यू) के वरिष्ठ प्रोग्राम हेड अभिषेक जैन का कहना है, रूफ टॉम सौर उर्जा परियोजनाओं की स्थापना का काम विकेंद्रीकृत है, जिससे इस दिशा में प्रगति धीमी है, क्योंकि इसके तहत यदि आप 500 उपभोक्ताओं (जिनमें से यदि हर उपभोक्ता यदि दो वाट का संयत्र स्थापित करता है) को जोड़ते हैं तो आप एक मेगावाट सौर ऊर्जा का लक्ष्य पाते हैं। इसलिए इस दिशा में प्रशासनिक प्रक्रिया बहुत महंगी पड़ती है। सोलर पार्क की स्थापना संभवतः सबसे उत्तम जरिया है, क्योंकि इससे छोटे-छोटे उत्पादकों के सामने पेश आ रहीं दिक्कतों का समाधान हो जाता है। सीईईडब्ल्यू की वरिष्ठ प्रोग्राम हेड कनिका चावला कहती हैं, भूमि अधिग्रहण इस दिशा में सबस बड़ी चुनौती है, लेकिन सोलर पार्क की स्थापना से यह समस्या हल हो जाती है। अमूमन एक मेगावाट बिजली के उत्पादन के लिए चार एकड़ भूमि की जरूरत होती है।

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