भोजन की बर्बादी रोकिए और भूख से लड़िए

प्रभुनाथ शुक्ल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने अपनी मन की 30 वीं बात मंे दो बड़ी बातें की हैं। पीएम ने अन्न की बर्बादी रोकने और एक दिन डीजल-पेटोल का उपयोग न करने की देश वासियों से अपील की है। कुछ बातें सामान्य लगती हैं लेकिन उनमें छुपी नसीहत बड़ा संदेश देती है। हममें से हर कोई व्यक्ति यह महसूस करता है और पश्चाताप करता है जब उसकी जेब से एक रुपये भी फालतू खर्च हो जाते हैं, यहीं नहीं वह उस खोट सिक्के पर भी सिर धूनता है जो उसकी जेब से कहीं खो जाता है। लेकिन अन्न की बर्बादी कभी हमारी चिंता नहीं बनी। शायद इसलिए भी कि, जिस समाज में हम जी रहे हैं, या फिर रहते हैं वहां अपनी और अपने परिवार के अलावा आसपास के समाज एवं उसमें रहने वाले लोगों के बारे में कभी सोचा भी नहीं।

आज पूरी दुनिया और देश में लाखों लोग भरपूर अन्न होने के बाद भी भूखे पेट सोने को मजबूर हैं। आपको याद होगा जब देश में अन्न की बेहद कमी थी तो पूर्व पीएम रहे पंड़ित लालबहादुर शास्त्री ने सप्ताह में एक दिन उपवास करने की नसीहत दी थी। दुनिया के सामने भूखमरी, कुपोषण वैश्विक चुनौती बन गई है। हमें पीएम मोदी की अपील को गंभीरता से लेना चाहिए। हम भौतिक और भोगवादी संस्कृति में अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों को खंटी पर टांग दिया है। आधुनिक भारत में अपने आसपास ऐसा वतावरण बना लिया है जिसकी परिधि में समाज और उसमें रहने वाले लोगों की चिंता गायब है। हमारी सोच व्यक्गित विकासवादी हो गयी है। सामाजिक उद्देश्य और संपूर्णता गायब है। भारत में बढ़ती अभिजात संस्कृति की वजह से भोजन की बर्बादी की समस्या भी बढ़ रही है। शहरों में 40 फीसदी भोजन शादी समारोहों या दूसरे आयोजनों के बाद कूड़ा घर में चला जाता है। यह पूरी दुनिया की चिंता और चिंतन का विषय है। दक्षिण एशिया में भारत कुपोषण की स्थिति बेेहद चिंतनीय है। नेशनल फैमली हेल्थ सर्विस के अनुसार 100 में से 40 बच्चा ग्रोथ जबकि 60 मासूम वनज की समस्या के शिकार हैं।

भारत में भोजन को अन्न देवता की उपाधि मिली हैं। वाराणसी में अन्नपूर्णा देवि का भव्य मंदिर भी है। काशी विश्वनाथ मंदिर में मत्था टेकने वाला हर व्यक्ति मां अन्नपूर्णा से जरुर आशीर्वाद लेता है। भारतीय स्ंकृति में भोजन ग्रहण के पहले भगवान का भोग लगाता है। लेकिन हमने कभी भोजन की बर्बादी पर ध्यान नहीं दिया। गांवों में शादी समारोह या सांस्कृतिक आयोजनों में बचा भोजन गरीबों में बांट दिया जाता है या फिर पशुओं को खिलाने में काम आता है। लेकिन शहरों में इस तरह का भोजन कूड़े संस्कृति की भेंट चढ़ता है। होटल और रेस्तराओं में हर रोज बहुमूल्य अन्न खराब होता है। जबकि हमारे देश में बुंदेलखंड और दूसरे इलाकों में आज भी लोग घास की रोटी खाते हैं। बुंदलखंड में लगातार कई सालों से पड़ रहे सूखे के बाद स्वयंसेवी संस्थाओं ने रोटी बैंक की स्थापना की है। जहां लोगों के घरों से बचे भोजन को इकट्ठा कर जरुरतमंदों में बांटा जाता है। यह आधुनिक और अभिजात भारत की जमींनी सच्चाई है।

दुनिया भर में साल भर में जितना भोजन बनता है उसमें 1 अरब 30 टन बेकार चला जाता है। इस भोजन से दो अरब लोग अपनी भूख मिटा सकते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक आंकड़े के मुताबित दुनिया में हर सातवां व्यक्ति भोजन की बर्बादी की वजह से भूखा सोता है। इस मामले में भारत 67 वीं श्रेणी में आता है। भारत में हर साल 25 करोड़ टन से अधिक खाद्यान्न का उत्पादन होता है, लेकिन बावजूद हर चौथा व्यक्ति भूखों सोता है। देश में हर साल 23 करोड़ दाल, 12 करोड़ फल और 21 करोड़ टन से अधिक सब्जियां वितरण प्रणाली और रख रखाव के बिना खराब होती हैं। विश्व खाद्य संगठन के अनुसार भारत में 50 हजार करोड़ रुपये का भोजन हर वर्ष बार्बाद हो जाता है। यह कुल उत्पादन का 40 फीसदी हिस्सा होता है। यह बात सिर्फ भोजन की बर्बादी तक नहीं सीमित है। इसे पकाने में जल, उर्जा और लकड़ियों, उपले भी खराब होते हैं। जिसका असर हमारे जल, जंगल और पर्यावरण अलावा उर्जा पर पड़ता है। प्राकृतिक संसाधनों को बोझ उठाना पड़ता है। भारत में जितना भोजन खराब हो जाता है उसे पकाने में 230 क्यूसेक पानी लगता है। अगर यह पानी बच जाए तो हम 10 करोड़ लोगों की प्यास बुझा सकते हैं। इतना ही नहीं इस पैसे से हम पांच करोड़ मासूमों का कुपोषण मिटा उतने ही लोगों को खाद्य सुरक्षा गारंटी का लाभ दिलाने में कामयाब हो सकते हैं।

हम दुनिया में नया मुकाम हासिल करने में लगे हैं। दुनिया को हम और दुनिया हमें नए नजरिए से पढ़ रही है। लेकिन हमारे लिए यह चिंता की बात हैं की हमारे देश में 10 लाख बच्चों की मौत हर साल कुपोषण से होती है, जिनकी उम्र पांच के मध्य होती है। जबकि देश में स्कूलों में दोहरी भोजन के साथ बाल विकास कल्याण जैसी योजनाएं संचालित हैं। यह हम नहीं यूनेस्कों यानी संयुक्तराष्ट संघ के आंकड़े कहते हैं। भारत में 2.1 करोड़ टन अनाज बेहतर रख रखाव की सुविधा के बिना खराब हो जाता है। प्रत्येक भारतवासी 10 किलोग्राम से अधिक अन्न खराब करता है। दुनिया में 1.3 अरब टन अन्न बर्बाद किया जाता है जबकि 87 करोड़ लोग भूखे पेट सोने को बेबस हैं। वैश्विक अर्थव्यस्था में जिसकी छति 700 अरब डालर से अधिक है। भारत में हर चौथा और दुनिया में हर सातवां व्यक्ति भूखे पेट सोने को मजबूर हैं। देश में पहले से ही ऐसे कानून मौजूद हैं जिनमें फिजूलखर्ची और शादी या दूसरे समारोहों में मेहमानों के आमंत्रिण के लिए भी नियम बने हैं। लेकिन यह सब कानून की किताबों तक सीमित हैं। आम आदमी की जिंदगी में उसका कोई उपयोग नहीं है। हम कायदे और कानूनों से समस्या का हल नहीं कर सकते हैं। हमें अपनी सोच का दायरा खुद की सुख सुविधाओं के साथ उस आदमी तक भी ले जाना होगा जो भूखे पेट सो जाता है। एक रोटी अगर हमारी भूख मिटा सकती है तो आधी रोटी उस इंसान के लिए भी चाहिए जो हमारी आलीशान गगन चुम्बी इमारत के नीचे सड़क पर रोटियों के लिए तड़पता रहता है और हम कार से गुजरते वक्त उस तरफ देखना भी मुनासिब नहीं समझते। पीएम मोदी की चिंता जायज है, लिहाजा यह पूरी दुनिया और देश की सोच का हिस्सा बनना चाहिए। जिससे हमें कुपोषण और भूखमरी जैसे समस्या को मिटाने में कामयाबी मिल सके।

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