लचर ऑटो ईंधन नीति का तोड़ है बीएस-4



रमेश ठाकुर

सन 2003 से 2015 तक पांच बार केंद्र सरकार ने ऑटो ईंधन नीति को लागू करने का मन बनाया, लेकिन ऑटोमोबाईल कंपनियों ने ऐसा नहीं होंगे दिया। कंपनियों ने मुंह मांगा राजस्व व कमीशन देकर मैनेज कर लिया। कंपनियों को पता था अगर ईमानदारी से ऑटो ईंधन नीति के लागू हुए तो उनके मानकों के तहत वह काम नहीं कर पाएंगे। लेकिन पर्यावरण प्रदूषण नियंत्रण प्राधिकरण व पर्यावरणविद् सुनीता नारायण के संयुक्त प्रयास से कोर्ट ने कंपनियों व सरकार के मंसूबो पर पानी फेर दिया। कोर्ट के फरमान के बाद पूराने वाहन जो बीएस-3 के मद में आते हैं, उन्हें हटने का आदेश पारित कर बीएस-4 के वाहनों के पंजीकरण की अनुमति दी है। पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में हम आज भी दूसरे मुल्कों से कहीं पीछे है। यूरोप देशों में यूरो-7 का चलन शुरू हो गया है जबकि हम अभी भी बीएस-3 पर ही निर्भर थे। यूरोप देशों में जहरीली व घुटनकारी हवाओं पर काफी हद तक नियत्रंण हैं। खैर, देर आए दुरूस्त आए के तहत दूषित पर्यावरण की आबोहवा को काबू में करने के मकसद से सुप्रीम कोर्ट ने पूरे देश के भीतर बीएस-3 के वाहनों की ब्रिकी पर तत्काल प्रभाव से बंदी का फरमान जारी करके सराहनीय निर्णय लिया है। मालूम होना चाहिए कि बीएस की मात्रा जितनी बढ़ती जाएगी, प्रदूषण उतना ही कम होता जाएगा। दरअसल बीएस मात्रा के बढऩे से हम सीएनजी पर निर्भर हो जाते है पेटृो पदार्थ की निर्भरता कम हो जाती है। अदालत के इस विस्तृत एक्शन प्लान के ड्राफ्ट को सभी राज्य सरकारों की मंजूरी मिल गई है। इसलिए इस नियम को को लागू करने में कोई दिक्कत नहीं हो रही है। साथ ही आमजन का भी भरपूर यहयोग मिल रहा है। क्योंकि सभी दूषित आबोहवा से निजात पाना चाहते हैं। इस निर्णय से सबसे ज्यादा नुकसान ऑटोमोबाइल निर्माताओं को हो रहा है बावजूद इसके उन्होंने किसी भी तरह का विरोध नहीं किया है। अदालत का निर्णय इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि इससे हमारी आबोहवा में सूक्ष्म कणों यानी पार्टिकुलेट मैटर का उत्सर्जन काफी कम होगा और बीएस-4 वर्जन से तकरीबन 80 फीसदी व कारों से 50 फीसदी तक उत्सर्जन कम होने की गारंटी रहेगी। बाजार में जब बीएस-4 की अधिकता हो जाएगी उसके बाद हाइड्रोकार्बन और नाइटृोजन ऑक्साइड का कम उत्सर्जन होगा। इससे फिजा साफ होगी, इंसानी जीवन आसान होगा, खुली फिजा में सांस लेना सरल होगा। सड़कों पर दमघोटू काला धुंआ फेंकने वाले पुराने वाहनों को रोकना अब बहुत ही जरूरी हो गया था। हालांकि इन पुराने वाहनों को प्रतिबंध करने के लिए पहले भी कई नियम-कानून बनाए गए थे लेकिन अमल नहीं हो सका। लेकिन अदालत ने तुरंत बंदी का फरमान जारी करके किसी को कोई मौका नहीं दिया। दिल्ली-एनसीआर इस समय जहरीली हवा के गिरफत में है, यहां रहने वाले लोग कई तरह की बीमारियों से घिर गए हैं। आमजन के स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए इस तरह का फैसला काफी पहले ही लिया जाना चाहिए था। पर्यावरण प्रदूषण नियंत्रण प्राधिकरण व पर्यावरणविद् सुनीता नारायण के प्रसाय से ही यह सब संभव हो सका है इसलिए देशवासियों के साथ-साथ वाहन निर्माता कंपनियों को भी सुप्रीम कोर्ट के आदेश की प्रशंसा करनी चाहिए। पर्यावरण को बचाने के लिए पहले से ही काफी प्रयास किए जा रहे हैं। लेकिन अभी तक ईमानदारी से अमल नहीं किया जा रहा था। सरकारें जानबूझकर नहीं चाहती थी कि ऑटोमोबाइल कंपनियां पुराने वाहनों से तौबा करें, क्योंकि इन कंपनियों के बढ़ते कामकाज से सरकारों को बहुत राजस्व प्राप्त होता था। कमीशनखोरी भी बड़े पैमाने पर होती थी। गौरतलब है कि पिछले माह पर्यावरण प्रदूषण नियंत्रण प्राधिकरण (ईपीसीए) ने पूरे एनसीआर की आबोहवा को सुधारने के लिए एक समान नियम-कायदों वाला विस्तृत एक्शन प्लान का ड्राफ्ट उच्च न्यायालय को सौंपा था। ड्राफ्ट में दिल्ली सरकार, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) और ईपीसीए के एक्शन प्लान के प्रमुख प्वाइंट्स को शामिल किया गया है। इस प्लान की एक एक प्रति दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश सरकार को भी भेज दी गई थी। ताकि वह अपना पक्ष रख सकें। हालांकि दिल्ली सरकार ने अपनी आपत्ति जताई थी, पर उनकी दलील पर कोर्ट ने गौर नहीं किया। उरनकी आपत्ति को दरकिनार करते हुए अदालत ने मानवीय हितों की रक्षा करते हुए एतिहासिक निर्णय लिया।
बीएस-4 का मसौदा जब अदालत में भेजा गया तो उससे पहले तक पर्यावरण प्रदूषण नियंत्रण प्राधिकरण की कोर टीम की तरफ से काफी रिर्सच की गई थी। इसको लेकर कार्यालय में इसी प्लान पर सभी की प्रतिक्रिया लेने के लिए बैठकें भी बुलाई गई। बैठक में सभी राज्यों की ओर से आए इस ड्राफ्ट पर सहमति जताई गई। ईपीसीए अध्यक्ष डॉ भूरेलाल व सदस्य सुनीता नारायण ने तर्क दिया कि जल्द ही सभी राज्यों की इस सहमति प्रतिक्रिया के साथ सुप्रीम कोर्ट को अवगत करा दिया जाएगा। साथ ही मौजूदा इस ड्राफ्ट प्लान में दिल्ली-एनसीआर में इंटीग्रेटेड ट्रांसपोर्ट प्लान को बढ़ावा देने की दलील दी गई। दलील में कहा गया था कि बीएस-3 के बाद बीएस-4 में सभी बस, टैक्सी और ऑटो का परमिट एनसीआर क्षेत्र का कॉमन हो। क्योंकि इसके बाद सभी वाहन सीएनजी से ही चलें। पर्यावरण प्रदूषण नियंत्रण प्राधिकरण द्वारा कोर्ट में दिए मसौदे में एनसीआर के सभी जिलों में एयर मॉनिटरिंग स्टेशनों का जाल बिछाने का जिक्र भी है। इसके अलावा पर्यावरण संरक्षण को ध्यान में रखते हुए अपने ड्राफ्ट प्लान में दिल्ली के बदरपुर थर्मल पावर प्लांट, उत्तर प्रदेश के दादरी थर्मल पावर प्लांट के अलावा हरियाण के झज्जर में 1500 मेगावाट क्षमता वाले झाड़ली थर्मल प्लांट को भी बंद करने की सिफारिश की गई है। इस पर पर्यावरण प्रदूषण नियंत्रण प्राधिकरण की दलील है कि इन सभी थर्मल प्लांटों को बंद करके इन्हें एलएनजी यानी लिक्विफाइड नेचुरल गैस से ही संचालित किया जाए। सुप्रीम कोर्ट में पर्यावरण प्रदूषण नियंत्रण प्राधिकरण ने अपनी स्वतंत्र दलील में कहा है कि अदालत इस निर्णय को शहर-गांव हर जगह एक साथ लागू करने का निर्णय लें। कोर्ट ने उनके मसौदे को उनके ही अनुकूल लागू किया। दरअसल यह सामजिक हित में लिया गया मानवीय कदम है। इससे कईयों की जिंदगियां बच सकेंगी।

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