समस्याओं के समाधान ही नहीं, रामलीला पर भी ध्यान 



सियाराम पांडेय ‘शांत’
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ रोज ही कुछ बड़े और कड़े फैसले ले रहे हैं। अयोध्या में वर्षों से बंद पड़ी रामलीला का मंचन फिर शुरू करने के उनके निर्णय को कमोवेश इसी रूप में लिया जा सकता है। कुछ राजनीतिक दल इस बहाने उन पर धर्म की राजनीति करने का आरोप लगा रहे हैं लेकिन योगी आदित्यनाथ नेता बाद में और संत पहले हैं। उन्हें पता है कि राम की राह पर ही चलकर यह देश आगे जा सकता है। सामाजिक उत्थान, स्नेह, सहयोग और सहकार चाहिए तो जीवन में राम के आदर्शों को अपनाना ही होगा। आजादी की लड़ाई भी राम के नाम पर ही लड़ी गई थी फिर विकास की जंग राम के बिना कैसे लड़ी जा सकती है। योगी आदित्यनाथ ने अधिकारियों को निर्देश दिया है कि अयोध्या में वर्षों से बन्द पड़ी रामलीला का मंचन नए सिरे से प्रारम्भ कराया जाए। मथुरा में रासलीला एवं चित्रकूट में भजन संध्या कार्यक्रम को सुचारु रूप से संपन्न कराया जाए। उन्होंने काशी विश्वनाथ मन्दिर में ई-पूजा, ई-डोनेशन, कैलाश मानसरोवर यात्रा एवं सिन्धु यात्रा के लिए ऑनलाइन आवेदन एवं ई-डिस्ट्रिक्ट पोर्टल को एक पखवारे में लांच कराने के निर्देश भी दिए हैं। यह निर्देश उन्होंने धर्मार्थ कार्य विभाग के प्रस्तुतिकरण के दौरान दिए। उन्होंने  धार्मिक स्थलों की सुरक्षा के लिए चहारदीवारी के निर्माण की भी बात कहीं। तीर्थ यात्रियों एवं श्रद्धालुओं की सुविधाओं के मद्देनजर  अप्रोच रोड बनाने का कार्य भी पूरा किया जाए।
अयोध्या में 14.77 करोड़ रुपये की लागत से निर्मित भजन संध्या स्थल का निर्माण कार्य जून 2018 तक हर हाल में समग्र गुणवत्ता के साथ पूरा कराया जाए। चित्रकूट में भजन संध्या एवं परिक्रमा स्थल के निर्माण कार्य हेतु स्वीकृत 13.75 करोड़ रुपये से निर्मित होने वाले कार्यों को तय समयसीमा में पूर्ण कराया जाए। उत्तर प्रदेश के सुप्रसिद्ध मंदिरों के संपर्क मार्ग चार लेन के बनाए जाएं। श्रद्धालुओं के बैठने, विश्राम गृह, पेयजल सुविधाओं के विकास कार्य भी प्राथमिकता से कराए जाएं। धार्मिक महत्व तालाबों का जीर्णोद्धार एवं सौंदर्यीकरण भी द्रुत गति से हो। ब्रज चैरासी कोसी परिक्रमा परिपथ का विकास एवं जनसुविधा कार्य विकसित कराने के भी मुख्यमंत्री ने निर्देश दिए हैं। विपक्ष निश्चित रूप से इस मुद्दे पर उन्हें घेरने की कोशिश करेगा लेकिन इस सच से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि लंबे समय से उत्तर प्रदेश में हिंदू जनमानस की उपेक्षा होती रही है। हिंदू धार्मिक स्थलों की अनदेखी हुई है और यह सब कथित धर्म निरपेक्षता के नाम पर हुआ है और इसका असर लोकजीवन और सामाजिक एकजुटता और सांप्रदायिक सौहार्द की भावना पर भी पड़ा है। यह भी किसी से छिपा नहीं है। कोई यह नहीं कह सकता कि योगी का ध्यान केवल धर्म पर है। वह विकास की हर छोटी-मोटी बाधा को दूर करने के लिए प्रयासरत हैं लेकिन इस सच को भी नकारा नहीं जा सकता कि वर्षों पुराने मोर्चे को छुड़ाने के लिए काफी डीजल, पेट्रोल, केरासिन और रैगमाॅल की जरूरत होती है। सालों की विसंगतियां दूर करने में समय तो लगता ही है।
रामलीला में प्रभु श्रीराम का गुणों का बखान ही नहीं, मानव जीवन की हर समस्या का समाधान भी है। रामचरित मानस और गीता सामान्य ग्रंथ नहीं है। यह जीवन जीने के पद्धति ग्रंथ हैं। उनमें वर्णित आदर्शों और सिद्धांतों को अगर जीवन में अपनाया जाएगा तो विसंगतियों और विडंबनाओं के लिए,पूर्वाग्रह  और मनमानी के लिए गंुजाइश बचेगी ही नहीं। महर्षि बाल्मीकि ने राम को विग्रहवान धर्म कहा है। अयोध्या राम की है। अगर राम की पूजा, राम की लीला अयोध्या में ही नहीं होगी तो और कहां होगी? इसे इस देश और प्रदेश का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि जब कभी राम के भजन- पूजन, उनके गुणानुवाद और मंदिर निर्माण की बात आती है। तथाकथित धर्म निरपेक्ष ताकतों के कान खड़े हो जाते हैं। उनकी सक्रियता बढ़ जाती है। वे इस बात को भूल जाते हैं कि राम भारत के आस्था पुरुष हैं। उनमें और उनकी अयोध्या में भारत का मन रमता है। अयोध्या भारत ही नहीं, पूरी दुनिया के आकर्षण का केंद्र है। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने अपने एक चुनाव अभियान की शुरुआत इसी क्षेत्र से की थी। राहुल गांधी भी चुनाव पूर्व अयोध्या गए थे। रामलला के दर्शन उन्होंने भले ही न किए हों लेकिन हनुमान गढ़ी में हनुमान जी  और महंत ज्ञानदास का आशीर्वाद उन्होंने जरूर लिया था। सपा और बसपा दोनों ही को राम के नाम पर भाजपा को घेरने से पहले यह भी सोचना चाहिए कि बसपा संस्थापक कांशीराम के नाम के अंत में राम है तो समाजवादी योद्धा डॉ. राम मनोहर लोहिया के नाम में भी। गोस्मामी तुलसीदास ने अगर रामलीला की परंपरा विकसित की तो राम मनोहर लोहिया नेे ही अंतरराष्ट्रीय रामायण मेला की शुरुआत की थी, लेकिन अब जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने अयोध्या में रामायण संग्रहालय की 154 करोड़ की योजना बनाई और संस्कृति मंत्री डॉ. महेश शर्मा ने उनके प्रतिनिधि के रूप में अयोध्या यात्रा की। योजना का स्थल देखा तो ‘बाबरी मस्जिद की राजनीति’ करने वाले सेकुलर समाज का हंगामा शुरू हो गया था। उत्तर प्रदेश की पूर्व अखिलेश सरकार ने विधानसभा चुनाव से थोड़ा पहले ही अयोध्या की ऐतिहासिक सांस्कृतिक विरासत को अक्षुण्ण रखने के लिए 22 करोड़ की लागत से एक थीम पार्क की घोषणा की थी। उनकी इस घोषणा से भाजपा में कुछ हद तक खलबली भी मची थी लेकिन मुलायम सिंह यादव ने अयोध्या में कारसेवकों पर गोली चलवाने का वायदा कर अखिलेश के सभी किए-धरे पर पानी फेर दिया था। महेश शर्मा की अयोध्या यात्रा को कांग्रेस और बसपा ने चुनावी स्टंट करार दिया था । वामदलों की ओर से भी इस बावत तीखी प्रतिक्रया आई थी। आरोप लगाया गया था कि विधानसभा चुनाव के मद्देनजर ही केंद्र सरकार रामायण परिपथ की घोषणा कर रही है। विकथ्य है कि केंद्र की मोदी सरकार में यह कसरत पिछले जून माह से ही चल रही थी। ‘रामायण परिपथ’ पर बनी राष्ट्रीय समिति की बैठक 14 जून, 2016 को हुई थी। डॉ. महेश शर्मा के साथ केंद्र व उत्तर प्रदेश सरकार के अधिकारी भी बैठक में शामिल हुए थे।
केंद्र सरकार की रामायण परिपथ योजना में चित्रकूट, सीतामढ़ी, दरभंगा, जगदलपुर व रामेश्वरम् भी शामिल किए गए थे। जाहिर तौर पर यह बड़ी योजना है। इसकी सफलता देश को नई दिशा देगी और इससे कई राज्य लाभान्वित होंगे। विलाप करने वाले दलों की आपत्ति घोषणा के समय को लेकर थी। आरोप था कि विधानसभा चुनावों के ठीक पहले ऐसी घोषणा कर मोदी सरकार राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश कर रही है। उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि मोदी सरकार रामायण परिपथ के साथ ही बौद्ध परिपथ, श्रीकृष्ण परिपथ, पूर्वोत्तर परिपथ जैसी 12 सांस्कृतिक योजनाओं पर काम कर रही है। लेकिन अयोध्या को लेकर राजनीति में कुछ ज्यादा ही उबाल था और आज भी है। इसमें न तब कमी आई थी और न आज आई है। वैसे उत्तर प्रदेश में जिस दिन योगी आदित्यनाथ की सरकार बनी थी, यह बात तो उसी दिन तय हो गया था कि अब राजनीति का निर्धारण धर्म से होगा।  योगी का अगला लक्ष्य रामायण परिपथ की योजना को साकार करना ही होगा। अगर इस योजना के तहत योगी आदित्यनाथ कुछ आगे बढ़े हैं तो इसमें गलत क्या है?  रामायण परिपथ में गुजरात में स्वामी नारायण छपिया संप्रदाय (अक्षरधाम ग्रुप ) का उद्गम करने वाले संत स्वामी नारायण की जन्मभूमि गोंडा जिले की छपिया, अयोध्या नरेश राजा दशरथ द्वारा मनवर नदी के तट पर बस्ती जिले के मखौड़ में श्रृंगी ऋषि द्वारा किए गए पुत्रेष्टि यज्ञ के पावन स्थल और अयोध्या में सरयू नदी के तट -घाट,अयोध्या नगर की चैदह और पंच कोशी परिक्रमा मार्ग आते हैं। इनका न केवल विकास होगा बल्कि उनका सुंदरीकरण भी होगा। राम जन्मभूमि, कृष्ण जन्म भूमि में अगर रामलीला और कृष्णलीला नहीं होगी तो कहां होगी? अववल तो अयोध्या में रामलीला बंद होनी ही नहीं चाहिए थी। अगर बंद हुई भी तो उसे चालू कराने के प्रयास तत्कालीन सरकारों के स्तर पर होने चाहिए थे लेकिन मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए पूर्ववर्ती सरकारों ने इस ओर ध्यान नहीं दिया। अखिलेश यादव साधुवाद के पात्र हैं, उन्होंने अयोध्या में भजन-कीर्तन स्थल के विकास की दिशा में सोचा तो सही लेकिन सत्ता के अंतिम समय में। इसका सीधा मतलब राम में आस्था रखने वाले हिंदुओं को अपनी ओर आकर्षित करने का था लेकिन अयोध्या में उनके पिता का व्यवहार हिंदू समाज आज तक भूल नहीं सका है। इसका खामियाजा उन्हें चुनाव में भुगतना भी पड़ा।
योगी आदित्यनाथ सरकार जिस तरह अधिकारियों पर काम का दबाव बनाए हुए हैं और उन्हें धड़ाधड़ निर्देश दिए जा रही है। यह सही भी है क्योंकि बिना दबाव के काम होने वाला नहीं है लेकिन सरकार के मुखिया और उनके मंत्रियों को यह भी ध्यान देना होगा कि जितने आदेश दिए गए, उनका क्रियान्वयन हुआ भी या नहीं और यदि नहीं तो इसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों पर कार्रवाई क्या हुई? योगी सरकार सही मुकीम पर चल रही है, उसे पहले विकास की प्राथमिकता तय करनी चाहिए। उसके एक मंत्री ने कहा है कि गरीब भाजपा को और भाजपा गरीबों को नहीं छोड़ सकती लेकिन योगी सरकार को इस बात पर भी गौर करना होगा कि हर काम हाथ में लेने के चक्कर में गरीबी हटाने का काम कहीं उसके हाथ से सरक न जाए। राम के आदर्शों और सिद्धांतों की प्रतिष्ठा तो हो लेकिन राम नाम की लूट के चक्कर में विकास का एजेंडा पीछे न रह जाए। फिलहाल इस प्रदेश की पहली जरूरत विकास है। वर्षों से यहां जड़ें जमाए बैठी समस्याओं का समाधान है। बेहतर तो यह होता कि सरकार फिलहाल इसी बिंदु पर फोकस करती।

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