ओबामा का आत्मविश्लेषण

डा. दिलीप अग्निहोत्री

अमेरिकी राष्ट्रपति का विदाई भाषण आत्मविश्लेषण की भांति होता है। इस प्रकार से वह अपना रिपोर्ट कार्ड जारी करता है। राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अपने गृहप्रान्त शिकागों में विदाई भाषण दिया। दो साल का कार्यकाल पूरा करने वाले राष्ट्रपति के लिए अमेरिका में कोई खास भूमिका नहीं रह जाती है। उसका पूरा ग्लैमर नये राष्ट्रपति पर सिमट जाता है। एक प्रकार का निर्वतमान हो रहे राष्ट्रपति अपने मन की बात रखते है। ओबामा के ऊपर दोहरा दायित्व था। एक तो शिकागो की विशाल सभा मे ंउन्हे अपना रिपोर्ट कार्ड पेश करना था। दूसरा दबाव चुनाव में उत्पन्न हुई परिस्थतियों का था। इसमें ओबामा की डेमाकेक्रेडिक पार्टी के पराजय का समाना करना पड़ा था। रिपब्लिकन पार्टी के डोनाल्ड ट्रम्प का राष्ट्रवाद कामयाब रहा। ट्रम्प के भाष्ण ने अमेरिकाके महौल को बदल दिया था। ओबामा को अपने ओर पिछले राष्ट्रपति चुनाव के दो बिल्कुल विपरित अनुभव से गुजरना पड़ा। ओबामा की गिनती अश्वेतों में थी। इसके अलावा उनके पिता मुसलमान थे। इसके बावजूद ओबामा ने केवल डेमोकेट्रिक पार्टी के उम्मीदवार बनाये गए वरन उन्हे दोबारा राष्ट्रपति बनने का भी अवसर मिला। यह अमेरिका का अलग मिजाज था। इसका ओबामा को भरपूर फायदा मिला। आठ वर्ष इसी अनुभव में गुजर गये। पिछले चुनाव में ओबामा राष्ट्रपति पद का खुद चुनाव नहीं लड़ सकते है। वह अपनी पार्टी को उम्मीदवार हिलेरी किलंटन का प्रचार कर रहे थे। लेकिन इसी में उन्हें अमेरिका के बदले मिजाज का सामना करना पड़ा। ट्रम्प ने ओबामा के कार्यों पर निशाना लगया। इसी के साथ उन्होनंे राष्ट्रवाद का कार्ड चला। ये सभी बाते किसी न किसी रुप में वह इस महाशक्ति के शासक थे। इसी अवधि मंे वैश्विक आंतकवाद बढ़ा था। आईएसआईएस जैसे संगठन बन गया। पाकिस्तान की आंतकी गातिविधियों बिना रोक-टोक के जारी रही। ऐसे में ट्रम्प ने जब आंतकवाद पर कठोर रुख की बात कही। तो उन्हें समर्थन मिला। बात सीरिया अफगानिस्तान आदि देशों तक सीमित होती तो बात अलग थी। लेकिन युरोप तक आंतकी हमले होने लगे। अमेरिका से भी खतरा टला नही था। ओबामा जब भाषण दे रहे थे। तभी अमेरिका में पांच आंतकियों को सुरक्षा बलो ने मार गिराया। वह बड़ी वारदात की फिराक में थे। यादि तनिक चुक होती तो उनका मसंूबा तबाही ला सकता था। मतलब साफ है। आंतकियों के निशाने पर अमेरिका आज भी बना हुआ है। आंतकियो से अमेरिका को सुरक्षित करने के लिए बड़ी धनराशि की जरुरत पड़ रही थी। ट्रम्प ने इन्ही मुद्दों को उठाया। वहीं अमेरिकी हित को सर्वोच्च वरीयता देने की बात कह रहे थे। अमेरिका में प्रायः इतने वैचारिक मतभेद के बीच राष्ट्रपति चुनाव दुर्लभ होते है। वहा माना जाता है कि डेमोकेट्रिक व रिपब्लिकन के बीच बड़े मतभेद नहीं होते है। सत्ता में आने के बाद इसलिए अमेरिकी निति का बड़ा बदलाव अपने ही चुनाव में देखा। दूसर बड़ा बदलाव अपनी विदाई के पहले देखा। इन सभी बातों का उल्लेख ओबामा ने अपने विदाई भाषण में दिया। अपने देश के लोगों को उन्होंने आर्थिक व सामाजिक उपलब्धियां बताई। यह बताया कि अमेरिका की अर्थव्यवस्था पहले वह मुकाबले मजबूत हुई। रोजगार के अवसर बढे़ है। अन्य सेवा क्षेत्रों में की भी उन्होंने चर्चा की। उन्होंने अमेरिकीा की समाजिक सदस्या को भेदभाव मुक्त बताया। यह कहा कि यहां रहेन वाले मुसलमान भी देशभक्त है। इनके साथ कोई भी भेदभाव नहीं होना चाहिये ये वह बाते थी जिनका केवल अमेरिका से कहा था, लेकिन अमेरिका का वैश्विक महत्व निर्विवाद है। वह विश्व एकमात्र महाशक्ति है। इस बात का अमेरिका को गर्व है ओबामा ने इसका अलग-अलग से उल्लेख किया है। उन्होंने कई कारणों की चर्चा की। जिन्होंने अमेरिका का महाशक्ति बताया। ओबामा की रिपोर्ट कार्ड वाले इस हिस्से का वैश्यिक महत्व है, जो उसकी विदेश निति से संबधित है। क्योकि यह सामान्य देश की विदेशनिति नहीं है। वरन महाशक्ति कि विदेश निति का वैश्विक महत्व होता है। ओबामा ने अपनी उपलब्धियां बताई, लेकिन कई महत्वपूर्ण मसलों पर उन्होंने विफलता भी मिली। ओबामा प्रशासन की इन्ही विफलताओं का ट्रम्प ने चुनावी मुद्दा बनाया था। यदि ओबामा उन्हे इनके समाधान में सफल रहते तो बहुत संभव कि ट्रम्प इनका लाभ लेने में नाकाम रहते। ओबामा से इस्लामी आतंकवाद के प्रति जैसी सख्ती की अपेक्षा थी। उसमें वह सफल नहीं हुए उन्होंने पाकिस्तान को आंख मूंद कर सहायता देना जारी रखा वह इस बड़ी धनराशि व सामरिक सहायता का उपयोग आंतकी संगठनों को सरंक्षण देने में लगाता रहा। आईएस जब अपनी ताकत बढ़ाने लगा था, तब ओबामा कोई फैसला नहीं ले सके। शुरु में उसके खिलाफ कार्यवाही हो जाती तो आईएस का विस्तार रोका जा सकता था। लेकिन तब ओबामा ने कहा जब ईराक सहायता की मांग करेगा तब देखा जायेगा। सीरिया में भी ओबामा ने लापरवाही दिखायी। आईएस की कमर तोड़ना प्राथमिकता होनी चाहिए, लेकिन ओबामा सीरिया की आंतरिक राजनिति में उलझ गये। चीन अनाधिकृत रुपसे कृत्रिम द्वीप व सैनिक अड्डा बनाता रहा। ओबामा उसके खिलाफ माहौल नही बना सके। उत्तर कोरिया की अराजकता भी सबके सामने है यदि इन सब मसलों पर ओबामा ने गंभीरता दिखाई होती तो वैश्विक महौल में सुधार होता है। ओबामा के आत्म विश्लेषण मे यह तथ्य शामिल होना चाहिये थे। बीस जनवरी को वह व्हाइट हाउस से विदा होंगे इन सभी वैश्विक समस्याओं का समाधान का दायित्व अब डोनाल्ड ट्रम्प पर होगा।

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