विकास की सरस्वती ऐसे तो नहीं दिखती

राजनीतिक दुनिया भी अजीब है। यहां दोस्ती और दुश्मनी का कोई स्थायी भाव नहीं होता। पल में तोला-पल में मासा वाले हालात होते हैं। सपा और कांग्रेस के गठबंधन को इसी रूप में देखा जा सकता है। राहुल गांधी ने इस गठबंधन को गंगा-यमुना का मिलन कहा है,वहीं अखिलेश यादव ने साइकिल के पहिए के रूप में इसे देखने की व्यंजना की है। राहुल गांधी ने यह विश्वास जाहिर किया है कि इस संगम से विकास की सरस्वती निकलेगी। जो भी इलाहाबाद के संगम तट पर गया है। उसने गंगा-यमुना का सितासित जल तो देखा ही होगा। दोनों नदियां एक दूसरे से मिलती तो हैं लेकिन अलग-अलग दिखती भी हैं। गंगा का जल सफेद है तो यमुना का हरा। सरस्वती तो दिखती ही नहीं। ऐसा माना जाता है कि वह अदृश्य है तो क्या राहुल के विकास की सरस्वती भी अदृश्य रहेगी। वह जनता को नहीं दिखेगी। केवल नेता ही उसे देख सकेंगे। खासकर कांग्रेस और सपा के। जनता तो बस महसूस करेगी कि विकास की कोई सरस्वती भी है। जिसे प्रकट होना है, लेकिन कब यह उनकी इच्छा पर निर्भर है। जनता का इस बावत विश्वास बना रहे, यही क्या कम है? वैसे दोनों ही दलों ने एक स्लोगन भी लांच कर दिया कि ‘यूपी को ये साथ पसंद है।’ पसंद है भी या नहीं, यह तो चुनाव नतीजे ही बताएंगे। यह अलग बात है कि राहुल गांधी को जितने अखिलेश पसंद हैं उतनी ही उनकी पत्थर वाली बुआ। वे मायावती और कांशीराम की इज्जत करते हैं। यह जानते हुए भी कि उन्होंने गलतियां की हैं। उनकी नजर में मायावती और भाजपा में बहुत बड़ा फर्क है। भाजपा गुस्सा फैलाती है, उनकी विचारधारा से हिंदुस्तान को खतरा है। मायावती की विचारधारा से देश को कोई खतरा नहीं है। पत्थर वाली बुआ की मुंह पर ही प्रशंसा हो रही हो तो अखिलेश क्या कहते सिवा मुस्कुराने के। जब उनकी बारी आई तो उन्होंने गठबंधन में गंगा-यमुना तो नहीं देखा। साइकिल से आगे बढ़ ही नहीं पाए। कह दिया कि राहुल और मैं साइकिल के दो पहिए हैं। एक दिन पहले ही उन्होंने कहा था कि कांग्रेस का हाथ अब साइकिल के हैंडल पर है। अब साइकिल और तेज गति से दौड़ेगी। साइकिल पर नियंत्रण तो हाथ का ही होता है। पहिए तो चलाने पर ही चलते हैं। कांग्रेस का सपा पर नियंत्रण कैसे हो सकता है? देर से ही सही, यह बात या तो खुद उनकी समझ में आ गई है या किसी ने उन्हें समझा दी है। खैर, उन्होंने जल्दी ही अपनी राजनीतिक गलती सुधार ली है। राहुल को भी पहिया बना दिया है। अब दोनों पहिए प्रदेश की राजधानी में घूम रहे हैं। रोड शो कर रहे हैं। इस रोड शो में भीड़ भी अच्छी खासी जुटी लेकिन इसमें केवल समर्थक ही नहीं हैं। राहगीर भी हैं जो अपने गंतव्य पथ पर जाते हुए भीड़ का हिस्सा बन गए है। कौतुक प्रिय जमात भी है। दोनों ही नेता जनता को यह बता-जता रहे हैं कि हम साथ-साथ हैं। लेकिन दिखाने की जरूरत क्यों हैं। यह बात तो जनता पहले से ही जानती ही है। प्रदर्शन नहीं तो राजनीति काहे की। राहुल गांधी ने मायावती की तारीफ कर दी तो सवाल तो उठता ही है कि क्या बसपा भी इस गठबंधन का हिस्सा हो सकती है या फिर उसे गठबबंधन में क्यों नहीं लिया गया। इसके जवाब में अखिलेश यादव का तर्क काबिलेगौर था। मायावती को गठबंधन में शामिल कैसे करते? वे ज्यादा जगह घेरती हैं। उनके हाथी को बैठने के लिए ज्यादा जगह की जरूरत होती है। हम लोग उन्हें जगह नहीं दे सकते थे। सच भी है कि साइकिल का आयतन कम होता है। थोड़ी जगह में खड़ी हो सकती है लेकिन हाथी के साथ वह बात नहीं है। सड़ा हाथी भी नौ लाख का होता है जबकि साइकिल की कीमत ही कुछ हजार ही है। राहुल की नजर में सपा से उनका गठबंधन दिल का है। सीटों की छोटी-छोटी बातें हैं तो उस पर समझौता हो जाएगा। कर दी न, छोटे दिल वाली बात। उनकी इस बात से इतना तो साफ हो ही गया है कि कुछ बातें कांग्रेस को अभी भी परेशान कर रही हैं। विवशता का गठबंधन टिकाऊ नहीं होता। जहां तक बात दिल की है तो वह टूटता ही है और टूटने पर जुड़ता नहीं। जोड़ने पर गांठ बनी रहती है और यह गांठ अखिलेश और राहुल की संयुक्त प्रेस कांफ्रेंंस में दिखी भी। इस दौरान राहुल गांधी ने मीडिया को संगम भी दिखाया। यह भी बताया कि जिस तरह गंगा और यमुना एक हो जाती हैं, वैसे ही दोनों पार्टियां एक होंगी और एक साथ लड़ेंगी। मतलब साफ है कि अभी एक हुई नहीं हैं। होंगी। यह ‘होंगी’ शब्द असमंजस पैदा करता है। अखिलेश प्रदेश में साइकिल दौड़ाने की बात करते नजर आ रहे हैं और राहुल कांग्रेस की मजबूती की बात कर रहे हैं। गठबंधन और समर्पण का फर्क तो खैर दोनों ही समझते हैं। राहुल की यह अवधारणा खटकती है कि कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में मजबूत करना है और देश में कांग्रेस की विचारधारा को चलाना है। अगर यह सब होगा तो समाजवादी विचारधारा और समाजवादियों का क्या होगा? बड़ी मुश्किल से रायबरेली और अमेठी जिले में सपा की पैठ बनी थी लेकिन अब इन दोनों जिलों की सभी दस सीटों पर कांग्रेस चुनाव लड़ेगी। कांग्रेस नेता संजय सिंह ने पहले ही स्पष्ट कह दिया था कि कांग्रेस के गढ़ में कांग्रेसियों को सपा बर्दाश्त नहीं है। गायत्री प्रजापति जैसे सपाई का टिकट कटना मायने तो रखता है। इसके बाद भी कांग्रेस अगर अपनी विचारधारा को चलाना चाहती है तो समाजवादी विचारधारा का क्या होगा? गठबंधन में विचारधारा और आदर्श मायने नहीं रखते, वहां तो बस अपना-अपना मशरफ होता है। राहुल और अखिलेश दोनों ही मानते हैं कि उनका गठबंधन 300 से अधिक सीटों पर जीत हासिल करेगा और प्रदेश में विकास की सरस्वती बहाएगा। इस दौरान राहुल ने हिंदुस्तान को बचाने की भी बात की है और इस निमित्त हर जाति के लोगों से एक साथ चलने का आह्वान भी किया है। यह भी कहा है कि कांग्रेस देश, प्रदेश और समाजवादी पार्टी सबके लिए ठीक है। क्या मतलब कांग्रेस सबके लिए ठीक नहीं है। राहुल दरअसल कहना क्या चाहते हैं। वे समाजवादी पार्टी को कमतर क्यों आंक रहे हैं। यही नहीं, वे उत्तर प्रदेश की जनता के रक्त संबंधों तक पहुंच गए और यहां तक कह दिया कि उत्त्तर प्रदेश के डीएनए में क्रोध और गुस्सा नहीं है। भाईचारा है, प्रेम है। वैसे भी किसी का डीएनए देखना अच्छी बात नहीं है। गुस्से की राजनीति से जनता का नुकसान हो रहा है। हमारे गठबंधन से प्रगति होगी, विकास होगा। नोटबंदी से दोनों ही नेता उत्साहित नजर आ रहे हैं। दोनों ही को इससे भाजपा को नुकसान और खुद का फायदा नजर आ रहा है। इस मामले में मायावती की क्या प्रतिक्रिया होगी लेकिन राहुल और अखिलेश की दोस्ती पर भाजपा का तंज तो देखने वाला ही है। सोशल मीडिया पर इस दोस्ती को ‘चोर-चोर मौसेरे भाई’ वाली कहावत से जोड़कर देखा जा रहा है। यह गठबंधन कितना चलेगा, यह तो वक्त तय करेगा लेकिन साइकिल पर हाथ की पकड़ होगी या हाथ पहिया बन जाएगा, यह ज्यादा विचारणीय है। हाथ जब भी पहिया बनता है या पहिए को संभालता है तो वह दो वर जरूर मांगता है। कैकेयी के दो वर दशरथ को कितने भारी पड़े थे, यह किसी से छिपा नहीं है। अखिलेश का गठबंधन का तजुर्बा नया है लेकिन उनके पिता मुलायम सिंह यादव गठबंधन के सहारे ही पहली बार मुख्यमंत्री बने थे। कम से कम उन्हें अपने पिता के गठबंधनजन्य अनुभवों का लाभ जरूर उठाना चाहिए। यह भी देखना चाहिए कि गुस्से की राजनीति को देखने के चक्कर में कहीं उनका गठबंधन गुस्से का शिकार न हो जाए। यह गठबंधन चुनाव में कितना कागर होगा, यह तो वक्त तय करेगा लेकिन इतना तो साफ है ही कि जिस दिल के मिलने की बात हो रही है। वह एक दूसरे के करीब नहीं है और सिर्फ गले मिलने और एक दूसरे को माला पहनाने भर से बात बनने नहीं जा रही। दूध में नमक का मिलना अच्छा नहीं माना जाता। मिलना तो दूध और चीनी का ही ठीक होता है। अब देखना यह होगा कि ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे की अवधारणा कितनी बलवती होती है और इस प्रदेश की जनता पर कितना प्रभाव छोड़ पाती है। हाथ हाथ तक ही सीमित रहे तो भी गनीमत है, वह पहुंचे और गले तक न पहुंचे, अखिलेश के लिए यह भी देखना मुनासिब होगा। अभी यह हाल है तो आगे क्या होगा?

लेखक- सियाराम पांडेय ‘शांत’

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