नोटबंदी के बाद हुए जो निकाय चुनाव

डॉ. दिलीप अग्निहोत्री

इसमें कोई संदेह नहीं कि स्थानीय निकाय चुनावों में वहां के मुद्दे महत्वपूर्ण होते हैं। इस हिसाब से विभिन्न क्षेत्रों के मुद्दे भी अलग-अलग होते हैं। पिछले कुछ समय में अनेक प्रदेशों के स्थानीय निकाय चुनाव सम्पन्न हुए। सभी में विभिन्न तस्वीर रही होगी, लेकिन इस बार नोटबंदी का विषय सभी प्रदेशों में समान रूप से प्रभावी था। खासतौर पर कांग्रेस पार्टी ऐसा नहीं मानती। चुनाव परिणाम उसके लिये निराशाजनक थे। उसका कहना है कि चुनाव स्थानीय मुद्दों पर होते हैं। इसलिये कांग्रेस अपने दिग्गजों की विफलता नहीं मानती। नोटबंदी का विषय अलग था। यह फैसला राष्ट्रीय स्तर का था किन्तु स्थानीय स्तर पर भी यह उतना ही महत्वपूर्ण था। लोगों को लाइन में लगना पड़ा, इसके चलते यह सबसे कारगर स्थानीय मुद्दा बन गया था। राष्ट्रीय स्तर पर इसकी अहमियत अपनी जगह पर कायम थी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के विरोधियों ने तो इसे मुद्दा बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। उन्होंने स्थानीय से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक अपने सभी नेताओं को खुला छोड़ दिया था। हरियाणा, राजस्थान आदि प्रदेशों में स्थानीय निकाय उस समय हुए थे, जब बैंकों के बाहर लम्बी-लम्बी लाइनें लगा करती थी। गैर भाजपा दलों ने लाइनों के इर्द गिर्द जमकर प्रचार किया था। वह लोगों को बता रहे थे कि आप सभी लोग बहुत परेशान हैं। मोदी जी ने सबको लाइन में लगा दिया। उस समय संसद का अधिवेशन भी चल रहा था। नोटबंदी के विरोध में विपक्ष संसद को बाधित बनाए हुए था। राहुल गांधी खुद लाइन में लग कर चार हजार रुपये बदलवाने गये थे। उनके साथ इलेक्ट्रानिक चैनलों का हुजूम था। खूब प्रचार हुआ। इतना ही नहीं, नोटबंदी को देश का सबसे बड़ा घोटाला करार दिया गया। यह सिलसिला आजतक जारी है। विधानसभा चुनाव हो या स्थानीय निकाय चुनाव, सभी में नोटबंदी को मुद्दा बनाने में विरोधियों ने कोई कसर नहीं छोड़ी। इसके बावजूद भाजपा की चुनावी सफलता का सिलसिला आगे बढ़ता रहा। हरियाणा, राजस्थान, गुजरात से शुरू हुआ उसका अभियान महाराष्ट्र तक जारी रहा। इसके बीच में असम व उड़ीसा के स्थानीय निकाय चुनाव हुये। दोनों जगह भाजपा को अभूतपूर्व सफलता मिली। असम में तो भाजपा सरकार बना चुकी है, लेकिन उड़ीसा में भाजपा कभी मुकाबले में नहीं रही। पिछले कई चुनावों में जहां बीजू जनता दल को सफलता मिलती रही है, वहीं कांग्रेस मुख्य विपक्षी भूमिका में थी। लेकिन स्थानीय स्तर पर अब उड़ीसा की तस्वीर बदलने लगी है। चुनाव में भाजपा को बड़ी सफलता मिली है। इस आधार पर कहा जा सकता है कि उड़ीसा में उसका जनाधार बढ़ रहा है। भविष्य में वह कांग्रेस की जगह ले सकती है, तब सत्तरूढ़ बीजद के भाजपा ही मुख्य मुकाबले में होगी। इसी प्रकार यूपी में विधान परिषद की तीन सीटों पर चुनाव हुए थे। इनमें भाजपा ने जीत दर्ज की। स्नातक क्षेत्र की इन सीटों का विस्तार अनेक जिलों तक था। सभी मतदाता नोटबंदी से प्रभावित थे, लेकिन भाजपा के प्रति नाराजगी दिखाई नहीं दी। यह दिलचस्प है कि यूपी के प्रत्येक चरण के चुनाव में भी नोटबंदी का मुद््दा खूब उछाला गया। राहुल गांधी, अखिलेश यादव और मायावती ने अपनी प्रत्येक जनसभा में नोटबंदी पर हमला बोला। इस मुद्दे पर बसपा और सपा-कांग्रेस गठबंधन में गजब की समानता कायम है। ये सभी नेता आमजन को लगातार याद दिलाना चाहते है, कि मोदी जी ने लाइन में लगवा दिया। यह अच्छा है कि नरेन्द्र मोदी ने इस मुद्दे से बचने का प्रयास नहीं किया। वह आमजन को हुई कठिनाई स्वीकार करते है, लेकिन भ्रष्टाचार के खिलाफ अपने अभियान को जारी रखने का संकल्प भी व्यक्त करते हैं। ऐसा नहीं है कि इन सभी प्रदेशों के स्थानीय निकाय चुनाव में केवल नोटबंदी ही एकमात्र मुद्दा था। स्थानीय स्तर पर अन्य मुद्दे भी रहे होंगे। इनके प्रति भी असम, राजस्थान, हरियाणा, गुजरात, महाराष्ट्र की भाजपा सरकारों के प्रति भी विश्वास व्यक्त किया। जबकि गुजरात, हरियाणा व महाराष्ट्र में जातिवादी आन्दोलनों को खूब हवा दी गयी। यह सब प्रदेश सरकारों को परेशानी में डालने के लिये था। लेकिन ऐसा हो नहीं सका। यहां की भाजपा सरकारें सामाजिक समरसता को बनाये रखने में सफल रहीं। महाराष्ट्र में शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने अदूरदर्शिता ना दिखाई होती तो सत्तरूढ़ गठबंधन अन्य सभी का सफाया कर देता। कांग्रेस के नेता अपने को संतोष देने के लिये कह रहे हैं कि शिवसेना ने भी नोटबंदी का विरोध किया था। इसके बावजूद वह मुंबई में सबसे बड़ी पार्टी बनी है। यह अधूरा विश्लेषण है। भाजपा से अलग होकर शिवसेना कहीं भी उल्लेखनीय प्रदर्शन नहीं कर सकी। मुंबई उसकी स्थापना के समय से ही उसका गढ़ रहा है। यहां भी भाजपा से उसे मात्र तीन सीटें ज्यादा मिल सकीं। शिवसेना को तो इस चुनाव पर आत्मचिंतन करना होगा। यदि उद्धव ठाकरे ऐसे ही फैसले करते रहे तो, वह बाला साहब ठाकरे की विरासत को कमजोर बना देंगे। उन्हें समझना होगा कि भाजपा के अलावा उनका स्वभाविक व सहज गठबंधन किसी अन्य दल के साथ नहीं हो सकता। अकेले लड़कर वह अपने को मजबूत नहीं बना सकेगी। मुंबई कांग्रेस अध्यक्ष संजय निरूपम से भी उनकी पार्टी के अन्य नेताओं को सबक लेना चाहिए। निरूपम ने केवल नोटबंदी पर ही हमला नहीं बोला था, वरन् सर्जिकल स्ट्राइक के सबूत मांगे थे। उनके नेतृत्व में कांग्रेस शक्ल दिखाने लायक नहीं रही। जाहिर है नोटबंदी पर विपक्ष देश के आमजन को प्रभावित नहीं कर सका। इसके बावजूद उसका इस मुद्दे से चिपके रहना आश्चर्यजनक है।

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