अमृतसर सम्मेलन में अफगानिस्तान

डा. दिलीप अग्निहोत्री

हार्ट ऑफ एशिया का विचार शांति, सुरक्षा, समृद्धि पर आधारित है। इसमें विभिन्न देशों के बीच आपसी सहयोग की भावना समाहित है। इसकी सफलता के लिए मानवतावादी दृष्टिकोण की आवश्यकता होती है। भारत और अफगानिस्तान दोनों की भौगोलिक त्रासदी एक जैसी है। इनकी सीमाएं पाकिस्तान से लगती है। वह आतंकवादी देश है। आतंक का उत्पादन और निर्यात उसका प्रमुख कार्य है। इसको वहां की सेना का पूरा संरक्षण है। उसकी देख-रेख में आतंकी शिविर चलते है, वह उनको प्रशिक्षण देती है। इसके चलते समस्या जटिल हो गयी है। भारत विशाल और सामरिक दृष्टि से मजबूत है। सीमापार के आतंकवाद का मुकाबला कर सकता है। इसके बावजूद लंबी सीमा, प्राकृतिक स्थिति और अपने यहां के कुछ संदिग्धों के कारण स्थायी समाधान मुश्किल हो जाता है। अफगानिस्तान इतना समर्थ नहीं रहा। इसलिए सीमा के पार के आतंकवाद से वह ज्यादा प्रभावित हुआ। दशकों के संघर्ष ने उसे बदहाल बनाया। तालिबान जैसे आतंकी संगठन को यहां शासन करने का मौका मिला। ऐसे तत्वों ने अफगानिस्तान को तबाह कर दिया है।

ऐसे में अफगानिस्तान की स्थिति सुधारना आवश्यक था। यहां की बड़ी आबादी मूलभूत सुविधाओं से वंचित है। इनको राहत पहुंचाना बड़ी समस्या है। हार्ट ऑफ एशिया के माध्यम से इस बदहाल मुल्क को संवारने की रूपरेखा बनाई गयी थी। इसमें अफगानिस्तान के समीपवर्ती देश शामिल हैं। यह कार्य कोई मुश्किल नहीं है। भारत, रूस, चीन, मध्य एशिया के देश, ईरान आदि मिलकर अफगानिस्तान में पुनः मूलभूत सुविधाओं की व्यवस्था कर सकते हैं। ये सभी देश मिलकर यहां ढांचागत सुविधाओं का विकास कर सकते है। वहां चले हिंसक संघर्ष ने स्कूल व अस्पतालों को ही सर्वाधिक नुकसान पहंुचाया है। रोजगार का अभाव है। बिजली की व्यवस्था न होने से उद्योग धंधे नहीं हैं। हिंसा के कारण लोग निवेश या कारोबार चलाने से डरते हैं।

जाहिर है कि अफगानिस्तान की समस्या दोहरी है। एक तो यहां मूलभूत सुविधाओं का विकास करना है, दूसरा आन्तरिक व सीमा पार के आतंकवाद का मुकाबला करना है। अमृतसर सम्मेलन में दोनों प्रकार की विचारधाराओं के दृश्य दिखाई दिए। अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी और भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने शांति-सौहार्द की भावना का प्रदर्शन किया। अशरफ गनी इसीलिए सम्मेलन शुरू होने से पहले अमृतसर पहुंच गये थे। गनी और मोदी दोनों स्वर्ण मंदिर साथ-साथ गए। यह भावनात्मक रिश्तों की अभिव्यक्ति थी। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के सलाहकार सरताज अजीज भी सम्मेलन शुरू होने से पहले अमृतसर पहुंच गए थे। लेकिन वह दूसरी विचारधारा का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। उनका उद्देश्य अफगानिस्तान में शांति-समृद्धि की बहाली नहीं था। वरन् वह इसलिए आए थे कि पाकिस्तान की आतंकी गतिविधियों पर चर्चा न हो, लेकिन उन्हेें मायूस होना पड़ा।

हार्ट ऑफ एशिया की स्थापना सकारात्मक उद्देश्य के लिए की गयी थी। इसमें दशकों से बदहाल अफगानिस्तान के जीर्णोद्धार का प्रमुख विचार समाहित था। इसे केवल एक देश तक सीमित मसला नहीं माना जा सकता। यह एशिया के हार्ट रूप में स्थित है। शांत और समृद्ध अफगानिस्तान सम्पूर्ण एशिया के लिए उपयोगी रहा है। दूसरी ओर यहां जब आतंकवादी व कट्टरवादी ताकतों का वर्चस्व रहा, तब अन्य देशों को भी परेशानी उठानी पड़ी। यह अफगानिस्तान की तालिबानी सत्ता थी जिसने पाकिस्तानी आतंकियों के साथ मिलकर अमेरिका पर हमला किया था। इसने पूरे पश्चिमी जगत को आतंकवाद पर अपना नजरिया बदलने को विवश कर दिया था। इसके पहले तक ये देश आतंकवाद को पाकिस्तान और उसकी सीमाओं पर स्थित देशों तक सीमित मानते थे। इतना अवश्य है कि अफगानिस्तान आतंक और कट्टरवाद से बहुत प्रभावित हुआ है। इसका एक कारण पाकिस्तान है। इसकी उत्तरी सीमा पर आतंकी संगठनों को पूरा प्रशिक्षण व संरक्षण मिलता है। दूसरा यह कि अफगानिस्तान में भी कट्टरवादी तत्व कम नहीं हैं। ये आतंकवादियों के मददगार हैं। इनके माध्यम से इन्हंे पनाह व सहायता मिलती है। आतंकी संगठनों को पाकिस्तान के बाद अफगानिस्तान ही पसन्द है। ऐसे तत्व अफगानिस्तान में आपदा प्रबन्धन से लेकर विकास कार्यों तक में बाधा उत्पन्न करते हैं। इसमें योगदान करने वाले विदेशी विशेषज्ञों व अधिकारियों पर भी हमले होते रहे हैं। फिर भी भारत के नागरिक यहां जान हथेली पर रखकर कार्य करते हैं। इस कार्य में अन्य देशों के सहयोग की अपेक्षा थी। इसी को ध्यान में रखकर 2001 में तुर्की के इस्तांबुल में हार्ट ऑफ एशिया की स्थापना की गयी थी। इसका मकसद अफगानिस्तान व उसके पड़ोसी देशों के बीच आपसी सुरक्षा व सहयोग बढ़ाना था। प्रतिवर्ष विशेष मसले पर आधारित इसका सम्मेलन होता है।

अमृतसर में आयोजित सम्मेलन पूरी तरह व्यावहारिक विषय पर आधारित था। इसका शीर्षक था- पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद और अफगानिस्तान का आर्थिक विकास’ इसी शीर्षक में अफगानिस्तान की वास्तविक समस्या समाहित है। इससे अफगानिस्तान की दशा और पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद का अनुमान लगाया जा सकता है। स्थानीय कट्टरवादियों और पाकिस्तानी आतंकवाद के चलते अफगानिस्तान की समस्याओं का समाधान आसान नहीं रहा है। एक तो आतंकवादियों के मुकाबले में अफगान सेना पूरी तरह सक्षम नहीं है। इस कारण राजधानी काबुल के सुदूरवर्ती स्थानों पर सरकारी तंत्र के मुकाबले आतंकी संगठनों का वर्चस्व है। इनका विकास या लोगों को सुविधाएं उपलब्ध कराने से कोई मतलब नहीं होता। इन्होंने हिंसा का माहौल कायम किया है। अक्सर विभिन्न आतंकी संगठनों के बीच वर्चस्व के लिए गैंगवार चलती है। दशकों के संघर्ष ने यहां शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली आदि की व्यवस्था को ध्वस्त कर दिया है। पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजई ने भी अपने शासनकाल में इस स्थिति को बदलने का प्रयास किया लेकिन आतंकी बाधाओं के चलते सुदूरवर्ती इलाकों में ऐसा करना संभव नहीं हुआ।

अमृतसर सम्मेलन में इन समस्याओं को बखूबी समझा गया। सीमा पार का आतंकवाद सबसे बड़ी समस्या है। पाकिस्तान के विरोध को नजरंदाज करते हुए सम्मेलन के घोषणा पत्र में आतंकवाद की निंदा की गयी। इसके अलावा पाकिस्तान के आतंकी संगठनों का भी उल्लेख किया गया। चीन ने भी इसका विरोध नहीं किया। भारत व अफगानिस्तान सीधे कार्गोलिंक से व्यापार करेंगे। पहले इसके लिए कराची पोर्ट का उपयोग होता था। बाधा बार्डर पर भी समय बर्बाद होता था। अन्य देशों के साथ भी कारोबारी रिश्ते बढ़ेंगे। इस अर्थ में सम्मेलन को उपयोगी माना जा सकता है। आपसी संवाद, संचार, व्यापार को बढ़ावा मिलेगा, किन्तु पाकिस्तान की आतंकी गतिविधियों पर लगाम के लिए अभी व्यापक प्रयास करने होंगे।

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