बदले माहौल की चिन्ता

डा. दिलीप अग्निहोत्री

डा. अम्बेडकर परिनिर्वाण दिवस का मायावती ने भरपूर फायदा उठाया। इस अवसर पर लखनऊ में आयोजित जनसभा को उन्होंने चुनावी रंग में बदल दिया। अपने को अंबेडकर का प्रमुख अनुयायी बताया। इसी के साथ अन्य सभी पार्टियों व नेताओं को अंबेडकर का विरोधी साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। ये बात अलग है कि इनमें वे पार्टियॉ शामिल थीं, जिनका किसी न किसी रूप में बसपा से समझौता हुआ था। इन समझौतों ने ही उत्तर प्रदेश में बसपा और उसकी प्रमुख मायावती को खास मुकाम तक पहुंचाया। जबकि अन्य प्रदेशों में बसपा का अस्तित्व नगण्य ही रहा। ऐसा नहीं कि अन्य राज्यों में पार्टी की जड़ें रोपने का प्रयास नहीं किया। उन्होंने अनेक राज्यों में अपने प्रत्याशी उतारे, जम कर चुनाव प्रचार किया, किन्तु कही भी उन्हें संतोषजनक परिणाम देखने को नहीं मिला। अस्तित्व के लिए मायावती पूरी तरह उत्तर प्रदेश पर निर्भर है। वह छः दिसंबर के अवसर को हांथ से कैसे जाने देती।

मायावती के भाषण में उनकी चिरपरिचित गर्जना थी। उन्होंने सभी विरोधियों पर जम कर हमला किया, किन्तु इस गर्जना के पीछे अपनी चिन्ता को छिपा नहीं सकीं। अघोषित रूप से वह प्रदेश के बदले राजनीतिक माहौल को स्वीकार करती दिखाई दीं। पिछले विधानसभा चुनाव तक वह इतना परेशान नहीं होती थीं। तब उनका मुकाबला केवल समाजवादी पार्टी से होता था। प्रदेश का मुख्य मुकाबला इन्हीं दोनों पार्टियों तक सिमटा था। दोनों एक दूसरे की कमजोरियों को भुना कर सत्ता में पहुंचती थीं। 2007 के चुनाव में मायावती ने सपा सरकार की कानून व्यवस्था को प्रमुख मुद्दा बनाया। सरकार विरोधी लहर का लाभ उठाने के लिए मैदान में केवल बसपा थी। उसे पूरा लाभ मिला। मायावती ने बड़े बहुमत से सरकार बनाई। किन्तु यह सरकार जनआकांक्षाओं को पूरा नहीं कर सकी। 2012 के चुनाव में सरकार विरोधी लहर का फायदा उठाने के लिए मुख्य रूप से सपा ही मौजूद थी। इतिहास ने दूसरे पक्ष के लिए अपने को दोहराया। सपा को उतने ही बहुमत से सरकार बनाने का अवसर मिला। शुरूआती दो वर्षो में मायावती यही सोचती रहीं कि अगले चुनाव में इतिहास उनके पक्ष में अपने को दोहराएगा। ये दो वर्ष मायावती ने दिल्ली में बड़ी निश्चिंतता से व्यतीत किए, किन्तु लोकसभा चुनाव परिणामों ने उनकी नींद उड़ा दी थी। उनका गम खाता न खुलने तक सीमित नहीं था, वरन् जिस वोट बैंक पर उनकी सियासत टिकी थी, उसमें भी सेंधमारी हो चुकी थी।

लोकसभा चुनाव के साथ शुरू हुई मायावती की चिन्ता आज तक कायम है। इसी की अभिव्यक्ति छः दिसंबर को हुई। पहले केवल सपा पर हमला बोलकर मायावती जी का काम चल जाता था। लड़ाई आसान हो जाती थी। अब ऐसा नहीं रहा। मायावती के भाषण से साफ था कि वह भाजपा और नरेन्द्र मोदी को अपने लिए बड़ी चुनौती मान चुकी है। इसमें सन्देह नहीं कि मोदी ने देश के दलितों के बीच अपनी लोकप्रियता बढ़ाई है। इस दिशा में उन्होंने एक नहीं अनेक ईमानदार पहल की। डां. अम्बेडकर के जीवन से संबंधित पांच स्थानों को स्मारक का रूप बहुत पहले ही मिल जाना चाहिए था, लेकिन यह कार्य मोदी ने किया। मायावती ने उनके नाम पर जिन स्मारकों का निर्माण किया, उसमें तो कैग रिपोर्ट में ही गड़बड़ी बताई गयी। डां. अंबेडकर ने दलितों से शिक्षित बनने का आह्वान किया था। यह जिम्मेदारी सरकार में बैठे लोगों की थी। कांग्रेस ने देश, प्रदेश में सर्वाधिक समय तक शासन किया। जाहिर तौर पर उसकी जवाबदेही सर्वाधिक थी। मायावती भी अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकतीं। पांच वर्ष उन्होंने बड़े बहुमत वाली सरकार चलाई, लेकिन दलितों को शिक्षित बनाने की दिशा में पर्याप्त प्रयास नहीं हो सके।

दूसरी ओर नरेन्द्र मोदी ने अम्बेडकर के जन्म स्थान से लेकर लन्दन तक उनके स्मारक बनवा दिए। दिल्ली में उनके नाम से जिस सेन्टर का निर्माण होना था, उसकी प्रगति ठप थी। दस वर्ष मायावती ने संप्रग सरकार का समर्थन किया। लेकिन एक बार भी उन्होंने इन कार्यो के लिए दबाव नहीं बनाया। आज मायावती की इस बात पर कौन विश्वास करेगा कि उन्होने वी.वी. सिंह सरकार पर मण्डल आयोग की सिफारिश लागू करवाने का दबाव बनाया था। मायावती उस समय ऐसी हैसियत में नहीं थी। सब जानते हैं कि वी.वी. सिंह ने केवल देवीलाल को अलग-थलग करने के लिए एकाएक सिफारिशें लागू कर दी थीं। मायावती पूरे प्रकरण में दूर-दूर तक कहीं नहीं थीं। इस दावे के द्वारा मायावती उत्तर प्रदेश के पिछड़ों को प्रभावित नहीं कर सकतीं। इस क्रम में मायावती ने एक और गलत बयानी की। एक समय था जब उन्होंने गुजरात में नरेन्द्र मोदी के लिए प्रचार किया था। आज वह न जाने कहां से जानकारी ले आयीं कि मोदी पिछड़े वर्ग से नहीं हैं। यह भी जोड़ा कि उन्होंने आरक्षण का लाभ लेने के लिए ऐसा किया। मायावती ने यह नहीं बताया कि मोदी और उनके परिवार ने इससे कितना लाभ उठा लिया।

डा. अम्बेडकर के योगदान पर कोई सन्देह नहीं है। उन्होंने वंचित वर्ग के उत्थान हेतु जीवन समर्पित कर दिया। लेकिन आज उनके नाम पर राजनीति करने वालों को अपने कार्यो का हिसाब देना चाहिए। खासतौर पर वह लोग जिन्हें पूर्ण बहुमत से सरकार चलाने का अवसर मिला। अंबेडकर ने संविधान में केवल वंचितों को संरक्षण नहीं दिया, वरन् ईमानदारी से कर्त्तव्यों के सम्यक निर्वाह शब्दावली वाली शपथ का भी प्रावधान किया। क्या उनके अनुयायी होने का दावा करने वाले सत्ता में आकर ऐसा कर सके। अंबेडकर ने पूरे वंचित समाज को अपना परिवार माना। क्या उनके नाम से राजनीति करने वालों ने भी यही किया। क्या सत्ता में आने के बाद उन्होंने अपने परिवार को आर्थिक रूप से जमीन से आसमान तक नहीं पहुंचा दिया। जाहिर है केवल महापुरूषों के नाम पर चुनावी वैतरणी पार नहीं हो सकती। सत्ता में रह चुके लोगों को अपनी उपलब्धियों को प्रमुख मुद्दा बनाने का प्रयास करना चाहिए। इसे छोड़कर जाति, मजहब की राजनीति पर ही फोकस करना, कमजोरी व परेशानी को रेखांकित करता है।

(लेखक चर्चित स्तम्भकार हैं। उपर्युक्त लेख लेखक के निजी विचार हैं।)

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