विश्व की सभी समस्याओं का शान्तिपूर्ण समाधान है ‘भारतीय संविधान का अनुच्छेद 51’

प्रदीप कुमार सिंह ‘पाल’, शैक्षिक एवं वैश्विक चिन्तक

भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति की मूल शिक्षा ‘‘वसुधैव कुटुम्बकम्’’ की भावना पर आधारित भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51 विश्व एकता का संदेश देता है। संविधान के अनुच्छेद 51 के अनुसार भारत का गणराज्य (क) अन्तर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा की अभिवृद्धि करेगा, (ख) राष्ट्रों के बीच न्यायसंगत और सम्मानपूर्ण संबंधों को बढ़ाने का प्रयत्न करेगा, (ग) संसार के सभी राष्ट्र अन्तर्राष्ट्रीय कानून का सम्मान करें ऐसा प्रयत्न करेगा तथा (घ) अन्तर्राष्ट्रीय विवादों का निबटारा माध्यस्थम् द्वारा हो का प्रोत्साहन देेगा। विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रित देश में धर्म निरपेक्ष तथा अनूठे संविधान का 26 जनवरी 1950 को जन्म हुआ था। देश के 125 करोड़ भारतीय के लिए यह एक सबसे महत्वपूर्ण राष्ट्रीय पर्व है। गणतन्त्र दिवस के पावन पर्व पर सभी भारतीयों को अपने महान संविधान के अनुच्छेद 51 पर चिन्तन, मनन व मंथन करना चाहिए। संविधान में समाहित ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की भावना को सारे विश्व के विभिन्न देशों में स्थित भारतीय दूतावासों के माध्यम से प्रसारित करने का यह दिवस है। भारतीय संविधान की पुस्तक विश्व के सभी देशों के राष्ट्रध्यक्षों तथा शासनाध्यक्षों को भेंट की जानी चाहिए।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51 के द्वारा राज्य तथा प्रत्येक नागरिक की बाध्यता के अनुरूप विश्वव्यापी समस्याओं का शान्तिपूर्ण समाधान प्रस्तुत करने का अनूठा प्रयास है, जिसके अन्तर्गत विश्वव्यापी न्याय, जय जगत, विश्व एकता व विश्व शान्ति के लिए ‘एक नई विश्व व्यवस्था’ का आह्वान किया गया है। हमें इस धरती को अपनी बाल एवं युवा पीढ़ी के साथ ही आगे जन्म लेने वाली पीढ़ियों के लिए रहने योग्य बनाना है। यह धरती हमारे ऊपर विश्व के बच्चों का सबसे बड़ा ऋण है। धरती से जाने के पूर्व इसे बेहतर विश्व के रूप में बच्चों को वापिस करके ऋण चुकता करना है।

प्रजातांत्रिक रूप से गठित ‘‘भारतीय संसद’’ का सबसे अधिक महत्व है। जहाँ देश की जनता द्वारा चुने माननीय सांसद 125 करोड़ लोगों की खुशहाली के लिए आपसी परामर्श करके सर्वमान्य तथा जनहितैषी कानून बनाते हैं। देश के विकास की धुरी संसद की दिशा तथा दशा पर ही देश की जनता का भविष्य दांव पर लगा होता है। इसलिए बहुत ही माथा-पच्ची तथा परामर्श के बाद संसद से देश भर में लागू होने वाले कानून बनते हैं। सरकार संविधान के अनुसार चले इस पर देश के सबसे बड़े न्यायालय सुप्रीम कोर्ट की हर पल नजर होती है। देश के लिए सर्वाेच्च न्यायालय का निर्णय अंतिम होता है।

देश संविधान तथा कानून से चलता है। वर्तमान में विश्व को प्रजातांत्रिक ढंग से चलाने के लिए हमारे पास विश्व का कोई संविधान नहीं है। ना ही प्रभावशाली विश्व कानून है। इस कारण से विश्व भर में आतंकवाद, शस्त्रों की होड़ तथा युद्धों से अराजकता, अव्यवस्था, कानूनविहीनता तथा तबाही मची हुई है। जिस प्रकार देश अपना है पराया नहीं। उसी प्रकार यह विश्व हमारा ही है पराया नहीं है। संयुक्त राष्ट्र संघ को शक्ति प्रदान कर विश्व की सबसे बड़ी पंचायत ‘‘विश्व संसद’’ का निष्पक्ष स्वरूप प्रदान करना चाहिए। ताकि ‘‘विश्व संसद’’ प्रभावशाली कानून बना सके। वर्तमान में संयुक्त राष्ट्र में पांच शक्तिशाली देशों अमेरिका, रूस, चीन, बिट्रेन तथा फ्रान्स को मिले वीटो पॉवर के कारण वह विश्व की निष्पक्ष संस्था नहीं है।

हेग, नीदरलैण्ड में स्थित इण्टरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्ट्सि का न्याय भवन स्थित है। वर्तमान में इस अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय के निर्णय किसी देश के लिए बाध्यकारी नहीं है। प्रत्येक सदस्य देश को यह स्वतंत्रता है कि वह अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय के निर्णय को माने या न माने। वर्तमान में विश्व की शान्ति की सबसे बड़ी संस्था संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देश युद्ध रहित, परमाणु शस्त्रों रहित तथा आतंकवाद रहित विश्व बनाने के मुद्दों पर संयुक्त राष्ट्र तथा इण्टरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस की प्रायः अवहेलना करते दिखाई देते हैं। आज गांव से लेकर देश स्तरों तक विवादों को निपटाने के लिए निष्पक्ष पंचायत से लेकर उच्चतम न्यायालय का गठन तो हमने किया है। लेकिन वैश्विक युग में धरती में अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं को निपटाने के लिए निष्पक्ष पंच की भूमिका निभाने वाली कोई अन्तर्राष्ट्रीय संस्था नहीं है।

आज सारा विश्व ज्ञान-विज्ञान के युग में जी रहा है। विभिन्न देशों के आपसी मतभेदों का फैसला निष्पक्ष पंच की भूमिका में ‘‘विश्व संसद’’ तथा उसके द्वारा गठित प्रभावशाली ‘‘विश्व न्यायालय’’ द्वारा त्वरित गति से किया जाना चाहिए। न्याय मिलने में देरी एक प्रकार से मानव जाति की खुशहाली के प्रति संवेदनहीनता तथा अन्याय ही माना जायेगा। धरती पर परमाणु बमों, आतंकवाद तथा युद्धों का नहीं वरन् प्रभावशाली विश्व कानून का राज होना चाहिए। इण्टरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस को विश्व के सभी देशों को एकजुट होकर शक्ति प्रदान कर प्रभावशाली ‘‘विश्व न्यायालय’’ का स्वरूप प्रदान करना चाहिए। यह कार्य हम जैसे साधारण व्यक्तियों के लिए असम्भव हो सकता है लेकिन विश्व के शीर्ष, सफल, विश्वव्यापी दृष्टिकोण वाले तथा सबसे लोकप्रिय शासकों के लिए यह कार्य बहुत आसान है।

विश्व में दो मंजिलों का मकान हमारे महान पूर्वजों द्वारा पहले से बना रखा है जिसमें नीचे की मंजिल में विधान सभायें तथा ऊपर की मंजिल में संसद चल रही है। अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं के शान्तिपूर्ण समाधान हेतु इस दो मंजिल के मकान में एक और तीसरी मंजिल ‘‘विश्व सरकार’’ के रूप में बनाना भर है। विश्व में सबसे लोकप्रिय राजनेता में ऐसे गुण जन्मजात अर्थात जीन्स में होते हैं। उनका हृदय सारी मानव जाति के लिए धड़कता है। ऐसा हम मानव सभ्यता के इतिहास में नीचे लिखे तीन ऐतिहासिक मौकों पर देख चुके हैं:-

(1) प्रथम विश्व युद्ध के समय 1919 में अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति श्री वुडरो विल्सन ने विश्व के नेताओं की एक बैठक आयोजित की, जिसके फलस्वरूप ‘लीग ऑफ नेशन्स’ की स्थापना हुई और सन् 1919 से 1939 तक विश्व में कोई अन्य युद्ध नहीं हुआ।

(2) द्वितीय विश्व युद्ध के समय अमेरिका के ही तत्कालीन राष्ट्रपति श्री फ्रैन्कलिन रूजवेल्ट ने 1945 में विश्व के नेताओं की एक बैठक बुलाई जिसकी वजह से 24 अक्टूबर, 1945 को ‘संयुक्त राष्ट्र संघ’ (यू.एन.ओ.) की स्थापना हुई। प्रारम्भ में केवल 51 देशों ने ही संयुक्त राष्ट्र चार्टर पर हस्ताक्षर किये थे। आज 193 देश इसके पूर्ण सदस्य हैं व 2 देश संयुक्त राष्ट्र संघ (यू.एन.ओ.) के अवलोकन देश (ऑबजर्बर) हैं। फ्रैंकलिन रूजवेल्ट की इस पहल के कारण पिछले 71 वर्षों से संसार में कोई और विश्व युद्ध नहीं हुआ।

(3) फ्रांस के प्रधानमंत्री श्री राबर्ट शूमेन ने यूरोपीय देशों के नेताओं की एक बैठक बुलाने की पहल की। इस पहली बैठक में 76 यूरोपीय संसद सदस्यों ने प्रतिभाग किया जिसके परिणामस्वरूप यूरोपीय यूनियन व 28 यूरोपीय देशों की एक ‘यूरोपीय संसद’ गठित की गई। इस यूरोपीय संसद की वजह से आज पूरे यूरोप में स्थायी एकता व शांति स्थापित है। आज यूरोपीय यूनियन में 28 यूरोपीय देश पूर्ण सदस्य राज्यों की तरह से हैं। यूरोपीय यूनियन के 18 देशों ने अपनी राष्ट्रीय मुद्रा को समाप्त कर ‘यूरो’ मुद्रा को अपनी राष्ट्रीय मुद्रा के रूप में अपनाया है। इस बैठक को आयोजित करने की पहल करना यूरोप में स्थायी शांति व सभी देशों में एकता स्थापित करने के लिए श्री राबर्ट शूमेन का एक महत्वपूर्ण कदम था। यदि इन तीनों विश्व के राजनैतिक नेताओं ने इन बैठकों को आयोजित न की होती तो सोचिए आज विश्व की क्या दशा होती?

सम्पूर्ण विश्व में अनिवार्य रूप से बच्चों को बचपन से ही कानून व्यवस्था एवं न्याय के मूल सिद्धान्त पढ़ाये जाने चाहिये और प्रत्येक बच्चे को कानून पालक, सुव्यवस्थित और न्याय संगत होना चाहिए। सभी कानून सामाजिक जरूरतों व समयानुकूल बनें व लागू हों जिससे सभी को न्याय दिया जा सके। न्याय वास्तविक न्याय होना चाहिये जिससे सभी ग्रामीण तथा शहरी निर्दोषों, बच्चों, गरीबों, लाचार तथा कमजोरों को मानवाधिकार व त्वरित न्याय तथा प्रत्येक बालक का ‘‘लर्निंग लेविल’’ बढ़ाने वाली गुणात्मक शिक्षा मिले। शिक्षक ही बालक के जीवन को अच्छे विचारों से सींचकर एक अच्छा नागरिक, अच्छा राजनेता, अच्छा समाजसेवी, अच्छा मीडिया कर्मी, अच्छा अभिभावक, अच्छा धार्मिक-आध्यात्मिक गुरू, अच्छा सैनिक, अच्छा वैज्ञानिक, अच्छा जज, अच्छा वकील, अच्छा डाक्टर, अच्छा व्यवसायी-किसान आदि बनाते हैं। इस प्रकार शिक्षक देश सहित सारे विश्व के असली हीरो होते हैं।

शिक्षक को ग्रामीण तथा शहरी प्रत्येक बालक का ‘‘सीखने का स्तर’’ (लर्निंग लेविल) बढ़े इस दायित्व तथा जवाबदेही को हृदय से स्वीकारना होगा। इसे हृदय से स्वीकारने भर से बालक के ‘‘सीखने का स्तर’’ उच्चतर होने की प्रक्रिया स्वतः शुरू हो जायेगी। ऊँचा सोचे अच्छा सोचे बच्चे विश्व नागरिक बन जाये। सभी सम्भव सेवाओं में सबसे सर्वश्रेष्ठ सेवा शिक्षक की है। शिक्षक को कर्मचारी की श्रेणी में नहीं वरन् ‘‘बच्चों के भाग्य निर्माता’’ की सबसे महत्वपूर्ण श्रेणी में रखा जाना चाहिए। उसे बच्चों के केवल जीवन निर्माण का कार्य पूरे मनोयोग तथा समर्पित भाव से करने देना चाहिए। युद्ध तथा हिंसा के विचार सबसे पहले मनुष्य के मस्तिष्क में उत्पन्न होते हैं। मनुष्य को शान्ति तथा अहिंसा के विचार देने के लिए उसके मस्तिष्क में शान्ति के बीज को रोपना होगा। मनुष्य को शान्ति के विचार देने की सर्वश्रेष्ठ अवस्था बचपन है। अर्थात जब बालक अबोध हो तब ही उसे शान्ति की शिक्षा दें।

विश्वविख्यात भौतिकशास्त्री स्टीफन हॉकिन्स ने कहा कि हमारी धरती के लिए यह बहुत खतरनाक समय है। हमारे पास धरती को नष्ट करने की तकनीक तो मौजूद है, पर हम वह नहीं तलाश पाए, जो इसे बचा सके। संभव है, कुछ सौ वर्षों में हम नक्षत्रों के आसपास भी अपनी कॉलोनी बना और बसा ले जाएं, मगर फिलहाल हमारे पास एक ग्रह पृथ्वी है और सबसे बड़ी जरूरत इसे बचाने के लिए मिलकर काम करने की है। ऐसा करने के लिए हमें तमाम देशों के अंदर और बाहर की सभी बाधाएं तोड़नी पड़ेगी। ऐसे समय में, जब सिर्फ नौकरी ही नहीं, उद्योगों की संभावनाएं भी क्षीण हो रही हों, हमारी जिम्मेदारी है कि लोगों एक नए विश्व के लिए तैयार करें। लेकिन जरूरी होगा कि विश्व के सभी विद्वान अतीत से सबक लें। हम मानवता के विकास के सबसे बुरे दौर में है। हर हाथ में फोन तो है, भले पानी न हो। इसी चमक को देख हमारे ग्रामीण गरीब बड़ी-बड़ी उम्मीदें लेकर झुंड के झुंड शहरों और कस्बों की ओर पलायन कर रहे हैं और हर दिन एक नए मायाजाल में उलझते चले जा रहे हैं। इसलिए हमारा मानना है कि मानव जाति के लिए सबसे बड़ी जरूरत धरती को बचाने के लिए मिलकर भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51 के अनुसार समाधान निकालने की है। ऐसा करने के लिए हमें अपने-अपने देश की संप्रभुता का थोड़ा-थोड़ा त्याग एक न्यायपूर्ण विश्व व्यवस्था बनाने के लिए करना पड़ेगा। इस सबसे महत्वपूर्ण कार्य में पल-पल की देर करने के कारण विश्व हर दिन एक नई मुश्किल में उलझता जा रहा है।

दूसरा पहलू यह है कि विश्व एकता सम्भव ही नहीं वरन् अब अनिवार्य है। विश्व इतिहास में पहली बार यह सम्भव हो सका है कि इस समूची धरती ‘पृथ्वी ग्रह‘ को एकता एवं समग्रता की दृष्टि से देखा जा सकता है। विकसित सूचना तथा संचार माध्यमों के सर्वसुलभ उपलब्धता से इस धरती पर सात अरब से अधिक जनसंख्या की मानव जाति के सामूहिक सुनहरे भविष्य के लिए सर्वमान्य ड्रीम महायोजना (प्रोजेक्ट) बनाने के जो सुअवसर इस क्षण हमारे पास हैं वे मानव इतिहास में इससे पहले कभी नहीं थे। भारत ही विश्व में एकता तथा शान्ति स्थापित कर सकता है। भारत को इस दिशा में विश्व एकता का एक कदम बढ़ाकर पहल करनी चाहिए। भारत को मानव जाति के हित में मानव सभ्यता के इतिहास में चौथा सबसे ऐतिहासिक कदम उठाकर ‘‘जगत गुरू’’ की अपनी विश्वविख्यात पहचान को पुनः स्थापित करना चाहिए। इस कदम से विश्व के दो अरब चालीस करोड़ बच्चों के साथ सारी मानव जाति भारत की सदैव ऋणी रहेगी। सारे विश्व को विश्वव्यापी समस्याओं का शान्तिपूर्ण समाधान निकालने के लिए ‘भारतीय संविधान का अनुच्छेद 51 के वसुधैव कुटुम्बकम्’ के सर्वमान्य एवं विश्वव्यापी चिन्तन को अपनाने की प्रेरणा देता है।

(लेखक शैक्षिक एवं वैश्विक चिन्तक हैं। उपर्युक्त लेख लेखक के निजी विचार हैं। )

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