घर की कलह ने डुबोई अखिलेश और सपा की नैया

लखनऊ : उत्तर प्रदेश का जनादेश इस बात को पुष्ट करता है कि पारिवारिक कलह और अखिलेश सरकार के मंत्रियों के कारनामों ने समाजवादी पार्टी की नैया को पूरी तरह से डुबो दिया। कोशिश तो यह थी कि पारिवारिक ड्रामे की आड़ में एंटी इनकंबेंसी फैक्टर को कम किया जाए, लेकिन अखिलेश का ‘काम बोलता है’ का नारा मतदाताओं को बिल्कुल रास नहीं आया। पारिवारिक कलह की वजह से अखिलेश ने पार्टी की कमान भले ही संभाल ली, लेकिन टिकटों के बंटवारे में गुटबाजी ने पार्टी को भारी नुकसान पहुंचाया। ‘यूपी को ये साथ पसंद है’ का नारा देकर कहां 300 से अधिक सीटें जीतने का दावा करने वाली अखिलेश की पार्टी 60 सीटों में सिमटती दिख रही है।

दरअसल, पारिवारिक कलह ने सपा को काफी नुकसान पहुंचाया। 13 सितंबर 2016 को पारिवारिक कलह सामने आने से पहले तक अखिलेश उत्तर प्रदेश में निर्विवाद और लोकप्रिय नेता के तौर स्थापित थे। उनकी साख पीएम मोदी से कहीं कमतर नहीं आंकी जा रही थी। लोकलुभावन फैसलों (युवाओं को लैपटॉप, स्मार्टफोन देने और समाजवादी पेंशन) से वे अपनी लोकप्रियता का का ग्राफ लगातार बढ़ा रहे थे, लेकिन पहले चाचा शिवपाल, फिर पिता मुलायम सिंह यादव से विवाद ने बबुआ (अखिलेश यादव) के चेहरे की चमक को धूल-धुसरित कर दिया।

राष्ट्रीय चुनाव आयोग से सपा के सिंबल साइकिल को भले ही अखिलेश ने बचा लिया, लेकिन पिता मुलायम की नाराजगी से यादव वोट बैंक का अखिलेश की सपा से खिसकना काफी भारी पड़ गया। मुलायम के प्रचार न करने का असर मतदान में साफ-साफ देखा गया। राहुल-प्रियंका से गठबंधन के वादे को घर-बाहर की नाराजगी के बावजूद निभा तो लिया लेकिन उम्मीद के अनुरूप सपा को इसका फायदा नहीं मिला। ये गठबंधन जनता तो दूर, सपा कार्यकर्ताओं तक को रास नहीं आया। कार्यकर्ताओं का कहना था कि हम जनता के इस सवाल का जवाब नहीं दे पा रहे हैं कि अगर ‘काम बोलता है’ तो कांग्रेस से गठबंधन की जरूरत क्या थी।

कैराना प्रकरण में नाराजगी के बावजूद मुस्लिम वोट अखिलेश के पक्ष में लामबंद दिखे, लेकिन पिछड़ों और अति-पिछड़ों में वैसी लामबंदी नहीं दिखी जैसी अखिलेश की सपा को जरूरत थी। ओबीसी का पूरा वोट बैंक भाजपा में खिसक गया और इस तरह से सपा का सूपड़ा साफ हो गया। यहां तक कि यादव वोटों में भी बिखराव दिखा। मोदी और अन्य नेताओं के भेदभाव के आरोपों की बरसात पर अखिलेश खुद स्पष्टीकरण देते दिखे। बिजली, श्मशान और कब्रिस्तान के मुद्दे पर सरकारी पक्ष को अखिलेश ठीक से नहीं रख पाए। जाति और मजहब के आधार पर लैपटॉप बांटने के आरोपों से अखिलेश इतने डिफेंसिव हो गए कि प्रेस कांफ्रेंस कर उन्हें पूरी लिस्ट जारी करनी पड़ी।

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