जस्टिस कर्णन ने सुप्रीम कोर्ट के सात जजों से 14 करोड़ का हर्जाना मांगा



जस्टिस कर्णन ने प्रधानमंत्री कार्यलाय को पत्र लिखकर कुछ सेवानिवृत और मौजूदा न्यायाधीशों पर भ्रष्टाचार में शामिल होने का आरोप लगाया था.

नई दिल्ली: उच्चतम न्यायालय के अवमानना का सामना कर रहे कलकत्ता उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति सीएस कर्णन ने सुप्रीम कोर्ट के सात वरिष्ठ जजों से 14 करोड़ का मुआवजा मांगा है. इस संबंध में आदेश भी जारी कर दिया गया है. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए जस्टिस कर्णन ने शुक्रवार (17 मार्च) को शीर्ष न्यायालय के सात न्यायाधीशों से चौदह करोड़ के मुआवजे की मांग करते हुए कहा कि उन्हें मानसिक रूप से परेशान किया गया और उनकी बेइज्जती की गई जिससे उनके सम्मान को ठेस पहुंची है.

गौरतलब है कि जस्टिस कर्णन ने प्रधानमंत्री कार्यलाय को पत्र लिखकर कुछ सेवानिवृत और मौजूदा न्यायाधीशों पर भ्रष्टाचार में शामिल होने का आरोप लगाया था. इसी मामले में उन पर उच्चतम न्यायालय की अवमानना का केस चल रहा है.

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अवमानना की सुनवाई शामिल होने से कर्णन का इंकार:

कलकत्ता उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति सीएस कर्णन ने खुद को ‘प्रताड़ित’ करने को लेकर उच्चतम न्यायालय द्वारा अवमानना की कार्रवाई के लिए स्वत: संज्ञान लेने का आरोप लगाते हुए शनिवार को (11 मार्च) कहा था कि वह 31 मार्च को अवमानना की कार्यवाही में शरीक नहीं होंगे.

उन्होंने यहां अपने आवास पर संवाददाताओं से बात करते हुए आरोप लगाया, ‘‘मुझे प्रताड़ित करने के लिए स्वत: संज्ञान लिया गया.’’ यह पूछे जाने पर कि क्या वह 31 मार्च को सात सदस्यीय संविधान पीठ के समक्ष निर्धारित अवमानना कार्यवाही में शरीक होंगे, न्यायमूर्ति कर्णन ने नकारात्मक जवाब देते हुए कहा, ‘‘मुझे क्यों होना चाहिए?’’

गौरतलब है कि उच्चतम न्यायालय ने अवमानना के एक मामले में उपस्थित नहीं होने को लेकर न्यायमूर्ति कर्णन के खिलाफ एक जमानती वारंट जारी किया था. न्यायमूर्ति कर्णन ने वारंट को लेकर शीर्ष न्यायालय पर पलवार करते हुए इसे असंवैधानिक करार दिया और आरोप लगाया कि दलित होने के चलते उन्हें निशाना बनाया जा रहा है।

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जज कर्णन के खिलाफ जारी हुआ था गिरफ्तारी वारंट:

उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार (10 मार्च) को अवमानना के एक मामले में पेश नहीं होने पर कलकत्ता उच्च न्यायालय के न्यायाधीश सीएस कर्णन के खिलाफ जमानती वारंट जारी किया. यह आदेश भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में अभूतपूर्व है. न्यायमूर्ति कर्णन ने 31 मार्च को उनकी उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए वारंट जारी करने पर शीर्ष अदालत पर पलटवार किया और इसे ‘‘असंवैधानिक’’ करार दिया. उन्होंने आरोप लगाया कि उन्हंे दलित होने पर निशाना बनाया जा रहा है.

इस प्रकार न्यायमूर्ति कर्णन भारतीय न्यायिक इतिहास में उच्च न्यायालय के ऐसे पहले कार्यरत न्यायाधीश बन गये हैं जिनके खिलाफ अवमानना के मामले में शीर्ष अदालत द्वारा गिरफ्तारी वारंट जारी किया गया है. प्रधान न्यायाधीश जी एस खेहर की अध्यक्षता वाली सात न्यायाधीशों की पीठ ने अवमानना नोटिस भेजे जाने के बावजूद न्यायालय में कर्णन के पेश नहीं होने का गंभीरता से संज्ञान लिया और पश्चिम बंगाल पुलिस के महानिदेशक को निर्देश दिया कि न्यायाधीश पर वारंट की तामील करायें ताकि 31 मार्च को सुबह साढे दस बजे उनकी उपस्थिति सुनिश्चित हो.

शीर्ष अदालत ने कहा कि ‘अच्छा होगा ’ अगर पुलिस महानिदेशक न्यायमूर्ति कर्णन को जमानती वारंट सौंपे. शीर्ष न्यायालय की इस पीठ में प्रधान न्यायाधीश के अलावा न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति जे चेलामेश्वर, न्यायमूर्ति रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति पी सी घोष और न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ शामिल थे. पीठ ने कहा कि इस याचिका के नोटिस विधिवत जारी किये गये हैं. इसके बावजूद जहां न्यायमूर्ति सीएस कर्णन की व्यक्तिगत उपस्थिति शीर्ष अदालत में अनिवार्य थी, वह न तो व्यक्तिगत रूप से ना ही अपने वकील के जरिये पेश हुए.

पीठ ने कहा कि इसे देखते हुए, जमानती वारंट जारी करके न्यायमूर्ति सीएस कर्णन की उपस्थिति सुनिश्चित करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता. इसके अनुसार आदेश दिया जाता है. गिरफ्तार करने वाले अधिकारी की संतुष्टि पर निजी मुचलके के रूप में 10 हजार रुपए का जमानती वारंट यह सुनिश्चित करने के लिए जारी किया जाता है कि न्यायमूर्ति कर्णन इस न्यायालय में 31 मार्च को सुबह साढे दस बजे उपस्थित हों.

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