जानिए क्या है यूपी की नई सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौतियां

जो भी प्रदेश का नया मुखिया तय किया जाएगा उससे प्रधानमंत्री मोदी की तरह कार्य करने की उम्‍मीद की जाएगी.

उत्तर प्रदेश की जनता ने अपनी नई सरकार चुन ली है. सारे कयासों और आकलनों को एक तरफ करते हुए जनता ने भाजपा पर पूरा भरोसा जताया है. यह प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी के काम तथा पार्टी के राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष अमित शाह की रणनीति की जीत कही जानी चाहिए. सरकार और संगठन के तालमेल ने उप्र के सारे राजनीति समी‍करणों, अवसरी गठबंधनों तथा चुनावी अभियानों को शिकस्‍त दी है. न केवल यूपी बल्कि मणिपुर में पार्टी का वोट प्रतिशत बढ़ा है और यही उसकी ‘वैचारिक’ जीत भी है. पार्टी में चहुंओर जश्‍न हैं, विजय गुलाल से माथे दमक रहे हैं, चेहरे पर सफलता की मुस्‍कान है और दिल में जनता का साथ पाने का विश्‍वास गमक रहा है. लेकिन, नेतृत्‍व के लिए जश्‍न का यही समय चिंतन का गंभीर मौका भी है. यह जीत भरपूर चुनौतियों के साथ आई है. इन चुनौतियों का सिलसिलेवार जाना और समझना होगा.

यूपी में भाजपा ने मुख्‍यमंत्री के रूप में किसी चेहरे का सामने नहीं किया था बल्कि प्रधानमंत्री मोदी ने स्‍वयं को तथा अपने काम को आगे रखा. वहीं, संगठन के सारे सूत्र स्‍वयं राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष शाह ने थामे. यही कारण है कि पार्टी दोनों के नेतृत्‍व को जीत का श्रेय दे रही है. यह श्रेय ही अपने साथ बड़ी जवाबदेही लेकर आया है. जो भी प्रदेश का नया मुखिया तय किया जाएगा उससे प्रधानमंत्री मोदी की तरह कार्य करने की उम्‍मीद की जाएगी. जनता चाहेगी कि उसने जिस समाजवादी पार्टी की अखिलेश सरकार के कामकाज से नाराज हो कर भाजपा को छप्‍पर फाड़ कर मत दिया है, वह सरकार अपने कामकाज के पहले ही दिन से वर्तमान सरकार के उलट दिखाई दे. यह परिवर्तन 360 डिग्री होना आवश्‍यक है.

चुनाव प्रचार के द्वारा प्रधानमंत्री मोदी सहित भाजपा नेताओं ने अखिलेश सरकार की कमि‍यों को सिलसिलेवार गिनाया है, अब उन्‍हीं कमियों को क्रमश: दूर करने का जिम्‍मा नई सरकार पर है. मसलन, सपा भले ही शहरी यूपी को चमकाने का दावा करे लेकिन ग्रामीण उत्‍तर प्रदेश ‘यादवी बाहुबल’ से त्रस्‍त है. अपराधों का बोलबाला है और राजनीतिक गुंडागर्दी ने जनता में आंतरिक दहशत का निर्माण किया था जो साफतौर पर भाजपा के वोट में बदली है. नई सरकार के लिए चुनौती होगी कि वह कैसे इस आपराधिक प्रभाव से यूपी को मुक्‍त करवा सके.

अखिलेश सरकार ने कई लोकप्रिय योजनाओं की घोषणा की लेकिन मैदानी स्‍तर पर ये घोषणाएं पूर्ण नहीं हुई. लैपटॉप बांटे गए लेकिन कई गांवों में बिजली के अभाव में लेपटॉप खुले ही नहीं. अनुपयोगी महसूस होने पर लोगों अपने लेपटॉप बेच दिए. शिक्षा के अलावा, स्‍वास्‍थ्‍य सेवाएं यूपी का बड़ा मसला है. स्‍वास्‍थ्‍य सेवाओं में सुधार का आकलन का पैमाना यदि कुपोषण माना जाए तो यूपी की स्थिति सुधरने की जगह बिगड़ी ही है. 2016 में विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट में कहा गया था कि उप्र में 44 फीसदी बच्चे कुपोषण के शिकार हैं. ये आंकड़े वर्ष 2015 की तुलना में 20 फीसदी अधिक हैं.

बेरोजगारी की बात करें तो राष्‍ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन की 66 वीं रिपोर्ट के मुताबिक उत्तर प्रदेश बेरोजगारी के मामले में 11वें पायदान पर आता है. आंकड़ों के अनुसार उप्र में प्रति 1000 में से 39 व्‍यक्ति बेरोजगार हैं. शहरों में यह संख्‍या 29 तथा गांवों में 10 व्‍यक्ति प्रति हजार है. 21 करोड़ की आबादी वाले उप्र में 5 करोड़ से अधिक लोगों के बेरोजगार रहने पर सपा सरकार ने केवल बेरोजगारी भत्‍ता देने की ही पहल की. वहां सरकारी विभागों में 5 लाख पद खाली थे लेकिन सरकार इन्‍हें भरने के प्रति सदैव अगंभीर रही.

सपा ने अपनी आंतरिक कलह को प्रदेश के विकास के ऊपर रखा तथा जनता के हितों को नजरअंदाज किया. अब नई सरकार के लिए ये आंकड़ें काम करने तथा अपने काम की रफ्तार को मापने के मील के पत्‍थर हैं. इस लोकप्रिय सरकार को लोकहित की सरकार साबित होना होगा.

 

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