ऐसा लगता है संघ मोदी का विकल्प तैयार कर रहा है

देश में लोकतंत्र की आड़ में हिन्दुत्व विचारधारा पनप रही है। इसकी ताज़ा मिसाल उत्तर प्रदेश है। उत्तर प्रदेश ने देश की सियासत में एक ऐसी इबारत लिखी है, जिसका आने वाले वक़्त में गहरा असर पड़ेगा। नरेंद्र मोदी ने गुजरात से हिन्दुत्व की जो राजनीति शुरू की थी, वह अब उत्तर प्रदेश से परवान चढ़ेगी। भारतीय जनता पार्टी पहले से ही कहती रही है कि पूर्ण बहुमत मिलने के बाद देश में हिन्दुत्ववादी एजेंडे को लागू किया जाएगा। केंद्र में भी बहुमत की सरकार है और अब उत्तर प्रदेश में भी भाजपा ने बहुमत की सरकार बनाई है। ऐसे में देश-प्रदेश में हिन्दुत्ववादी विचारधारा को ध्यान में रखकर फ़ैसले लिए जाएं, तो हैरानी की बात नहीं होनी चाहिए।

क़ाबिले-ग़ौर है कि उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर चुनाव लड़ा, जबकि अन्य राज्यों में वह क्षेत्रीय नेताओं के नाम पर विधानसभा चुनाव लड़ती है। मध्य प्रदेश में शिवराज चौहान के नाम पर जनता से वोट मांगे जाते हैं। इसी तरह छत्तीसगढ़ में रमन सिंह और बिहार में सुशील मोदी के नेतृत्व में चुनाव लड़ा जाता है। इन राज्यों में भारतीय जनता पार्टी की तरफ़ से मुख्यमंत्री पद का दावेदार कौन होगा, यह भी पहले से ही तय होता है। फिर उत्तर प्रदेश में ऐसा क्या हो गया कि राज्य में नेताओं की एक बड़ी फ़ौज होने के बावजूद भारतीय जनता पार्टी को मोदी के नाम पर चुनाव लड़ना पड़ा। भारतीय जनता पार्टी के काफ़ी वरिष्ठ नेता उत्तर प्रदेश से ही हैं, जिनमें राजनाथ, कलराज मिश्र, कल्याण सिंह, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती आदि शामिल हैं। इसके बावजूद पार्टी ने इन नेताओं को तरजीह नहीं दी।

विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को उम्मीद से ज़्यादा कामयाबी मिली। अकेले उसके 312 विधायक जीते, जबकि सहयोगियों के साथ यह आंकड़ा 325 है। इसके बावजूद इनमें से कोई मुख्यमंत्री की कुर्सी तक नहीं पहुंच पाया। भाजपा ने सांसद योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाकर सबको चौंका दिया। इतना ही नहीं, उत्तर प्रदेश के सियासी इतिहास में पहली बार बने दो उप-मुख्यमंत्री दिनेश शर्मा और केशव प्रसाद मौर्य विधानसभा या विधान परिषद के सदस्य नहीं हैं। लोकसभा सांसद केशव मौर्या की भी पहचान एक कट्टर हिन्दुत्ववादी नेता की रही है। वह विश्व हिन्दू परिषद से भी जुड़े रहे हैं।

योगी सरकार के इकलौते मुसलमान मंत्री मोहसिन रज़ा भी विधानसभा या विधान परिषद के सदस्य नहीं हैं। वह कुछ वक़्त पहले ही भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुए थे। माना जा रहा है कि उत्तर प्रदेश में अल्पसंख्यक कल्याण विभाग और वक्फ़ बोर्ड समेत कई ऐसे निगम हैं, जिनका अध्यक्ष मुसलमान ही होता है। शायद इसलिए ही रज़ा को यह पद मिल गया, वरना भारतीय जनता पार्टी को 20 करोड़ से ज़्यादा आबादी वाले उत्तर प्रदेश में को एक भी मुसलमान ऐसा नहीं मिला था, जिसे वह चुनावों में उम्मीदवार बना पाती। पार्टी के वरिष्ठ नेता शाहनवाज़ ख़ान ने ख़ुद इस बात की तस्दीक की थी।

आख़िर क्या वजह है कि भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश में विधायकों को तरजीह देने की बजाय सांसद को मुख्यमंत्री बनाया। जानकारों का मानना है कि इतना बड़ा फ़ैसला भारतीय जनता पार्टी अकेले अपने दम पर नहीं ले सकती। इसके पीछे राष्ट्रीय स्वयंसेवक का एजेंडा काम कर रहा था। ऐसा लगता है कि संघ मोदी का विकल्प तैयार कर रहा है। योगी आदित्यनाथ की छवि कट्टर हिन्दुत्ववादी नेता की रही है। वह गोरखनाथ मंदिर के पूर्व महंत अवैद्यनाथ के उत्तराधिकारी हैं। वह हिन्दू युवाओं के सामाजिक, सांस्कृतिक और राष्ट्रवादी समूह हिन्दू युवा वाहिनी के संस्थापक भी हैं। वह एक समुदाय विशेष के ख़िलाफ़ विवादित बयान देने के लिए भी जाने जाते हैं। उनके विवादित बयानों की एक लंबी फ़ेहरिस्त है। पिछले साल जून में उनके इस बयान पर ख़ूब विवाद हुआ था, जिसमें उन्होंने कहा था, “जब अयोध्या में विवादित ढांचा गिराने से कोई नहीं रोक सका तो मंदिर बनाने से कौन रोकेगा।”

उससे पहले जून 2015 में योग के विरोध पर उन्होंने कहा था, “जो लोग योग का विरोध कर रहे हैं उन्‍हें भारत छोड़ देना चाहिए। जो लोग सूर्य नमस्‍कार को नहीं मानते उन्‍हें समुद्र में डूब जाना चाहिए।” इसी तरह फ़रवरी 2015 में उनका यह बयान आया, “अगर उन्हें अनुमति मिले तो वो देश की सभी मस्जिदों के अंदर गौरी-गणेश की मूर्ति स्थापित करवा देंगे। आर्यावर्त ने आर्य बनाए, हिंदुस्तान में हम हिंदू बना देंगे। पूरी दुनिया में भगवा झंडा फहरा देंगे। मक्का में ग़ैर मुस्लिम नहीं जा सकता है, वैटिकन में ग़ैर ईसाई नहीं जा सकता है। हमारे यहां हर कोई आ सकता है।” प्रदूषण और मुसलमानों की बढ़ती आबादी जैसे मुद्दों पर भी वह कई विवादित बयान दे चुके हैं।

उत्तर प्रदेश के 21वें मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ साल 1998 से लगातार भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर गोरखपुर लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। चुनाव के दौरान उनके समर्थकों ने ‘दिल्ली में मोदी, यूपी में योगी’ का नारा दिया था। उत्तर प्रदेश में योगी के मुख्यमंत्री बनने से यह साफ़ है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ देश के लोकतंत्र में हिन्दुत्ववादी विचारधारा को बढ़ावा दे रहा है। साल 2014 में केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार के बनने के बाद से देश में सांप्रदायिक घटनाओं में ख़ासी बढ़ोतरी हुई है। उत्तर प्रदेश के दादरी कांड के बाद एक समुदाय विशेष के ख़िलाफ़ हमले बढ़ गए। गौमांस के नाम पर लोगों का एक झुंड किसी पर भी टूट पड़ता था। इससे एक समुदाय विशेष के मन में असुरक्षा की भावना बढ़ गई। अन्य सियासी दलों ने मुसलमानों के इसी डर का ख़ूब फ़ायदा उठाया। इस तरह की घटनाओं ने वोटों के ध्रुवीकरण का काम किया। भाजपा समर्थित लोगों के वोट इकट्ठे हो गए और ग़ैर भाजपाई और मुसलमानों के वोट बंट गए।

मोदी भले ही सबका साथ, सबका विकास का नारा देते रहें, लेकिन सब जानते हैं कि उन्होंने किसका विकास किया और किसे अनदेखा किया। उनके ’जुमले’ तो जगज़ाहिर हैं। संवैधानिक पद पर बैठने के बाद व्यक्ति विशेष की मजबूरी बन जाती है कि उसे सबके हित की बात बोलनी ही पड़ती है, लेकिन भारतीय जनता पार्टी के नेताओं की यह विशेषता रही है कि वे कितने ही बड़े संवैधानिक पद पर क्यों न बैठ जाएं, बात सिर्फ़ अपने मन की ही करते हैं। भले ही इससे किसी को ठेस ही क्यों न पहुंचे। बहरहाल, उत्तर प्रदेश में आदित्यनाथ योगी का मुख्यमंत्री बनना राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की बड़ी जीत ज़रूर है, लेकिन यह भारतीय जनता पार्टी की सियासी हार है।

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