फिर पाँव जमाने के लिए क्षेत्रीय नेताओं को आगे लाए कांग्रेस



आज़ादी के बाद देश पर सबसे लम्बे अरसे तक एक छत्र शासन करने वाली कांग्रेस प्रदेशों में क्षेत्रीय नेताओं को आगे करके ख़ुद को मज़बूत बना सकती है। सियासत में राष्ट्रीय नेताओं के साथ-साथ क्षेत्रीय नेताओं का भी अपना वजूद हुआ करता है। क्षेत्रीय नेता अपने इलाक़े से जुड़े होते हैं। उन्हें मालूम होता है कि ज़मीनी हक़ीक़त क्या है, जनता की बुनियादी ज़रूरतें क्या हैं, जनता क्या चाहती है, उनकी पार्टी से जनता को क्या उम्मीदें हैं।

दरअसल, क्षेत्रीय नेताओं को नज़रअंदाज़ करना कांग्रेस के लिए काफ़ी नुक़सानदेह साबित हुआ है। हाल-फ़िलहाल की बात करें, तो कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में क्षेत्रीय नेताओं को नज़र अंदाज़ करके राज बब्बर को प्रदेश अध्यक्ष बना दिया। इसी तरह उत्तर प्रदेश की ज़िम्मेदारी भी दिल्ली की मुख्यमंत्री रही शीली दीक्षित को सौंप दी। बेशक शीला दीक्षित प्रभावशाली नेत्री हैं। वे लगातार तीन बार दिल्ली की मुख्यमंत्री बनीं। उन्होंने दिल्ली के विकास के लिए बहुत काम किए। उन्हें सियासत में प्रशासन और संसदीय कामों का ख़ासा अनुभव है। वे केंद्र में मंत्री भी रही हैं। लेकिन उत्तर प्रदेश के लिए वे बाहरी थीं।

ऐसा नहीं है कि कांग्रेस ने पहली बार क्षेत्रीय नेताओं को नज़र अंदाज़ किया है। इससे पहले भी ऐसा हो चुका है। कांग्रेस से गए कई नेताओं ने बाद में अपने सियासी दल बनाए और कांग्रेस को खुली चुनौती दी। कई नेता दूसरे सियासी दलों में शामिल होकर कांग्रेस के लिए मुसीबत का सबब बने। साल 1982 में तत्कालीन कांग्रेस के महासचिव राजीव गांधी ने आंध्र प्रदेश के क़द्दावर नेता टी अंजैय्याह पर टिप्पणी की थी और बाद में उन्हें पार्टी से निकाल दिया था। उनके बाहर होने से कांग्रेस की हालत लगातार कमज़ोर होती गई। उसी साल वजूद में आई तेलगु देसम पार्टी ने आंध्र प्रदेश में कांग्रेस के प्रभाव को तक़रीबन ख़त्म कर दिया।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी मतभेद की वजह से कांग्रेस छोड़कर ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस नाम से अपना नया सियासी दल बना लिया था। कांग्रेस से अपने सियासी सफ़र की शुरुआत करने वाली ममता साल 1984 में कोलकाता के जादवपुर लोकसभा क्षेत्र से साम्यवादी नेता सोमनाथ चटर्जी को हरा कर सुर्खियों में आई थीं। वह अखिल भारतीय युवा कांग्रेस की महासचिव भी रहीं। वे साल 1991 में नरसिम्हाराव की सरकार में वे मानव संसाधन, युवा कल्याण-खेलकूद और महिला-बाल विकास विभाग की राज्यमंत्री भी रहीं। उन्होंने प्रस्तावित खेल-कूद विकास योजना को सरकार से बहाली न मिलने पर इस्तीफ़ा दे दिया। फिर साल 1996 में केन्द्रीय मंत्री रहते हुए उन्होंने अपनी ही सरकार द्वारा पेट्रोल की क़ीमत बढ़ाए जाने का विरोध किया था। इसी तरह महाराष्ट्र के क़द्दावर नेता शरद पवार ने भी अपनी सियासी ज़िन्दगी कांग्रेस से शुरू की थी। साल 1967 में कांग्रेस पार्टी के टिकट पर बारामती विधानसभा क्षेत्र से चुनाव जीतने वाले शरद पवार, तारिक अनवर और पीए संगमा ने सोनिया गांधी के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाते हुए कहा था कि कांग्रेस पार्टी का प्रधानमंत्री उम्मीदवार भारत में जन्म लिया हुआ चाहिए न कि विदेशी। फिर जून 1999 में ये तीनों कांग्रेस से अलग हो गए और उन्होंने नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी की स्थापना की। मगर जब 1999 के विधानसभा चुनाव में किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला, तो उनकी पार्टी ने कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बनाई। इंदिरा गांधी और उनके बेटे संजय गांधी के विश्वासपात्र माने जाने वाले हरियाणा के क़द्दावर नेता चौधरी बंसीलाल ने साल भी 1996 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से अलग होकर हरियाणा विकास पार्टी की स्थापना की थी। बंसीलाल सात बार राज्य विधानसभा चुनाव जीते थे। केंद्र में महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारियां निभाने वाले बंसीलाल चार बार हरियाणा के मुख्यमंत्री बने। बाद में उनके बेटे सुरेंद्र सिंह ने अपनी पार्टी का कांग्रेस में विलय कर लिया था।

क़ाबिले-ग़ौर है कि सियासत में विश्वास पात्रों को साथ रखने का चलन है। इंदिरा गांधी ने हमेशा अपने पास उन लोगों को रखा, जिन्हें वे अपना विश्वासपात्र मानती थीं। इसी तरह राजीव गांधी ने भी अपने विश्वासपात्र अरुण नेहरू, अरुण सिंह, ऑस्कर फर्नांडिस और मणिशंकर अय्यर को अहमियत दी। पार्टी अध्यक्ष बनने के बाद सोनिया गांधी ने भी ऐसा ही किया। उन्होंने अहमद पटेल, जनार्दन द्विवेदी और अंबिका सोनी को अपने क़रीब रखा। इस दौरान पार्टी के कई वरिष्ठ नेता हाशिये पर चले गए, जिनमें अर्जुन सिंह, सीताराम केसरी, माखनलाल फोतेदार और नारायण दत्त तिवारी के नाम लिए जा सकते हैं। अब राहुल गांधी भी इसी परंपरा को निभा रहे हैं, लेकिन उनके साथ परेशानी यह है कि उनके चहेते नेता लोकप्रिय नहीं हैं। वे न तो भीड़ जुटा पाते हैं और न ही इस भीड़ को वोटों में तब्दील कर पाते हैं। राहुल गांधी के क़रीबी माने जाने वाले संजय निरुपम, सीपी जोशी, मधुसूदन मिस्त्री, अशोक चव्हाण, पृथ्वीराज चव्हाण और मोहन प्रकाश जैसे नेता जनमानस में कोई असर नहीं छोड़ पाते।

इसमें कोई दो राय नहीं है कि कांग्रेस दो गुटों में बंटी नज़र आ रही है। एक तबक़ा सोनिया गांधी के साथ और दूसरा राहुल गांधी के साथ खड़ा दिखाई देता है। कांग्रेस के साथ के नेता प्रभावशाली हैं, लेकिन राहुल गांधी के साथ के नेता बिना जनाधार वाले हैं। प्रदेशों में भी कांग्रेस नेताओं के अपने-अपने गुट हैं। ऐसे में ज़रूरत है कि वरिष्ठ नेताओं के सलाह-मशविरे के मार्गदर्शन में क्षेत्रीय नेताओं के हाथों में प्रदेशों की कमान सौंपी जाए। कांग्रेस के पास ऐसे बहुत से युवा चेहरे हैं, जिन्हें आगे करके पार्टी अपनी खोई ज़मीन हासिल कर सकती है। पूर्व केंद्रीय मंत्री व मध्य प्रदेश के गुना से कांग्रेस सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया भी प्रदेश में कांग्रेस को मज़बूत करने में अहम किरदार अदा कर सकते हैं। राज घराने से ताल्लुक़ रखने वाले सिंधिया आम लोगों से मिलते-जुलते हैं। उन्होंने मंत्री रहते हुए कभी अपनी गाड़ी में लालबत्ती नहीं लगाई। उनमें नेतृत्व क्षमता है। वे जन मुद्दे उठाने में आगे रहते हैं। इतना ही नहीं वे भाजपा नेताओं के हर हमले का उन्हीं के अंदाज़ में जवाब देना भी जानते हैं। मगर मध्य प्रदेश में कांग्रेस दिग्विजय सिंह, कमलनाथ और सुरेश पचौरी आदि गुटों में बंटी नज़र आती है। केंद्र में मंत्री रहे जितिन प्रसाद को उत्तर प्रदेश में शांतिप्रिय और विकासवादी राजनीति के लिए जाना जाता है। उनके पिता जितेन्द्र प्रसाद तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी और पीवी नरसिम्हा राव के सियासी सलाहकार रहे हैं। आरपीएन सिंह भी केंद्र में मंत्री रहे हैं।

पिछले दिनों पांच राज्यों में हुए चुनाव इस बात का सबूत हैं कि जहां-जहां क्षेत्रीय नेताओं के हाथ में पार्टी की कमान थी, वहां कांग्रेस ने अच्छा प्रदर्शन किया। कांग्रेस को अपने संगठन को मज़बूत करने और जनाधार बढ़ाने के लिए राज्यों में क्षेत्रीय नेताओं को आगे लाना ही होगा।

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