मोदी सरकार हिंदी के मामले में काफी दब्बू निकली



तमिलनाडु की द्रविड़ मुनेत्र कड़गम के नेता एम.के. स्टालिन ने केंद्र सरकार की हिंदी नीति को आड़े हाथों लिया है। ज़रा गौर करें कि उनका अपना नाम विदेशी है। रुसी है। अपने इस रुसी नाम को भी वे ठीक से नहीं लिखते। इसे वे अंग्रेजी के नकलची उच्चारण से लिखते हैं। स्तालिन नहीं, स्टालिन! अब उन्होंने जो लंबा-चौड़ा बयान दिया है, वह तमिल भाषा के समर्थन में उतना नहीं है, जितना अंग्रेजी के समर्थन में है। यदि वे सचमुच तमिल का समर्थन करते होते तो राष्ट्रीय स्तर पर उनका साथ देने के लिए मैं पूरी तरह से तैयार रहता लेकिन वे हिंदी-विरोध को ही तमिल-समर्थन समझ रहे हैं।
यदि भारत की संसदीय समिति ने यह आग्रह किया है कि संवैधानिक पदों पर बैठे हुए जो लोग हिंदी जानते हैं, वे भाषण हिंदी में ही दें तो इसमें कौन-सा जुल्म हो गया है? पहली बात तो यह कि यह नरेंद्र मोदी की राय नहीं है। यह संसद की उस कमेटी की राय है, जिसके ज्यादातर सांसद कांग्रेस के रहे हैं और जिसके अध्यक्ष चिदंबरम थे।

आप मोदी को फिजूल भला-बुरा क्यों कह रहे हैं? मोदी सरकार तो हिंदी के मामले में काफी दब्बू निकली है। अंग्रेजी के प्रति उसकी दिमागी गुलामी और कांग्रेस की दिमागी गुलामी में सिर्फ ऊपरी फर्क ही है। मोदी ने अब तक जितने भी कागजी अभियान चलाए हैं, उनमें से एक-दो को छोड़कर सभी के नाम अंग्रेजी में रखे गए हैं। हमारे ये नए नौसिखिए नेता भी कांग्रेसियों की तरह नौकरशाहों के नौकर बने हुए हैं।

स्टालिन-जैसे अ-हिंदीभाषी नेताओं से मैं आशा करता हूं कि वे हमारे हिंदीभाषी नेताओं को कोई ऐसा रास्ता बताएं, जिससे वे अंग्रेजी की गुलामी बंद करें और हिंदी के अलावा अन्य भारतीय भाषाओं का पूरा सम्मान करें। स्टालिन की इस बात से मैं सहमत हूं कि हर राष्ट्रीय अभियान का नाम सिर्फ हिंदी में न रखा जाए। उसका अनुवाद सभी भारतीय भाषाओं में भी किया जाए। तभी तो वह देश के हर झोपड़े, हर मोहल्ले, हर गांव तक पहुंचेगा।

स्टालिन अपने नाम का भी तमिल अनुवाद करें। सरकारी विज्ञापनों में भी सिर्फ लिपि बदलने से काम नहीं चलेगा। भाषा बदलनी चाहिए। दुकानों पर से अंग्रेजी नामपट हटाए जाने चाहिए। प्रांतीय भाषा में ऊपर और मोटा तथा हिंदी में नीचे और छोटा जरूर लिखा होना चाहिए। यदि उसे मोटा और ऊपर लिखें तो और भी अच्छा! आज भारत को महाशक्ति बनाने के लिए जबर्दस्त अंग्रेजी हटाओ आंदोलन की जरूरत है। यह हमारे वर्तमान दब्बू नेताओं के बस की बात नहीं है। डर यही है कि वे हिंदी की आरती उतारते-उतारते अन्य भारतीय भाषाओं को उसका दुश्मन न बना लें।

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