सभी को ‘चोर’ करार देने वाले केजरीवाल आरोपों पर चुप क्यों?



आम आदमी पार्टी में बवाल थमने का नाम नहीं ले रहा है। कुमार विश्वास का मामला अभी शांत नहीं हुआ था कि अब दिल्ली सरकार के पूर्व मंत्री कपिल मिश्रा ने केजरीवाल के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। कपिल ने केजरीवाल पर भ्रष्टाचार के संगीन आरोप लगाये हैं। केजरीवाल इन आरोपों का जवाब या सफाई देने की बजाय मामला टालते दिख रहे हैं। यहां सवाल केजरीवाल की बोलती बंद या टालमटोल के रवैये का नहीं है। असल में आम आदमी पार्टी की पैदाइश जन आंदोलन से हुई है। राजनीतिक दल बनने के बाद से अरविंद केजरीवाल और उनकी पार्टी केवल आरोप−प्रत्यारोप की राजनीति ही करती रही है। ऐसे में जब घर से ही उंगुली केजरीवाल की ओर उठने लगी तो मामले की गंभीरता को समझा जा सकता है।

भ्रष्टाचार को खत्म करने और वैकल्पिक राजनीति का जो सपना अन्ना और उनकी टीम ने दिखाया था वो सपना दिल्ली की मात्र दो साल की सत्ता ने बुरी तरह कुचल दिया है। शुरूआती दिनों की चमक−दमक के बाद कुछ ही दिन बीते थे कि सब कुछ पटरी से उतरता महसूस होने लगा। जिस तेजी से ये पार्टी राजनीतिक पटल पर उभरी उससे भी ज्यादा तेज गति से विवादग्रस्त होती गई। अब तो पार्टी के अंदर से ही शीर्ष नेतृत्व के खिलाफ आवाज उठने लगी है।

यहां सवाल नैतिकता, पारदर्शिता, जवाबदेही और शुचिता का है। सवाल यह भी है कि केजरीवाल वैकल्पिक राजनीति और व्यवस्था लाना चाहते थे या वैकल्पिक भ्रष्टाचार के मूक पैरोकार बनना चाहते थे? केजरीवाल ने अपने ही स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन से दो करोड़ रुपए नकद लिए थे या नहीं? राशि किस मद में ली गई? केजरीवाल कैबिनेट में तब तक पर्यटन एवं जल संसाधन मंत्री रहे कपिल मिश्रा के आरोपों को यूं ही कैसे खारिज किया जा सकता है? कपिल भी केजरीवाल की ‘कोटरी’ के ही सदस्य थे। ऐसे में कपिल के आरोपों को हलके में नहीं लिया जा सकता है।

केजरीवाल विरोधी दलों खासकर भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर उनकी पार्टी को बदनाम करने और काम में अडंगे लगाने के आरोप लगाते रहते हैं। लेकिन इस बार आरोप किसी भाजपा, कांग्रेस ने नहीं लगाए या प्रधानमंत्री मोदी ने कोई नई चाल नहीं चली थी। तो केजरीवाल अपने ही मंत्री की चश्मदीदी गवाही पर बोलते क्यों नहीं? कपिल मिश्रा के आरोप या लेन−देन की पुष्टि जांच का विषय है, लेकिन दिल्ली के छतरपुर में सात एकड़ फार्महाउस की 50 करोड़ रुपए में जो डील कराने का आरोप है, लोक निर्माण विभाग में 10 करोड़ रुपए के फर्जी बिलों को सही करने का जो आरोप है, उसके जवाब तो देने ही होंगे। वह कथित सौदा किसी और ने नहीं, स्वास्थ्य मंत्री जैन ने मुख्यमंत्री के साढ़ू बंसल के परिवार के लिए कराया था या नहीं? यह जवाब भी केजरीवाल को देना है या फिर जांच एजेंसियां देंगी।

इस मामले में न तो प्रथम दृष्ट्या अरविंद को कसूरवार माना जा सकता है और न ही कपिल को झूठा। हालांकि कुमार ने कहा कि केजरीवाल के विरुद्ध ऐसे आरोप पर तो उनका दुश्मन भी विश्वास नहीं करेगा किन्तु आम आदमी पार्टी और अरविंद दोनों की छवि अब 2014−15 वाली नहीं रही। कपिल मिश्रा ने पार्टी नेतृत्व से पंगा लेने के इरादे तो पहले ही दिखा दिए थे। कपिल मिश्रा ने केजरीवाल पर आरोप लगाया लेकिन कोई प्रमाण तो नहीं दिये पर इतना दावा जरूर किया कि उसने उन्हें रकम लेते हुए अपनी आंखों से देखा तथा जब मुख्यमंत्री से पूछताछ की तो वे ये कहते हुए टाल गए कि राजनीति में बहुत सी बातों का तुरन्त जवाब नहीं दिया जाता। कपिल ने उनके साथ हुई और बातों का भी जिक्र किया परन्तु भंडाफोड़ करने के लिये वे मंत्री पद से हटाए जाने तक क्यों रूके रहे इसका उत्तर उन्होंने नहीं दिया। केजरीवाल सरकार के वे संभवतः अकेले मंत्री हैं जिन्हें बेदाग कहा जाता था। नगर निगम चुनाव में आम आदमी पार्टी का पत्ता साफ हो जाने के बाद जिन नेताओं ने ईवीएम पर ठीकरा फोड़ने की बजाय पार्टी की रीति−नीति और नेतृत्व पर हमले किये उनमें कपिल भी थे। उन्हें डॉ. कुमार विश्वास खेमे का माना जाता था जिनका असंतोष बीते सप्ताह खुलकर सामने आने के बाद उन्हें राजस्थान का प्रभारी बनाकर मना लिया गया लेकिन उनके कटु आलोचक को विधानसभा की महत्वपूर्ण समितियों में स्थान देना तथा समर्थकों को निकाल बाहर करना या फिर महत्वहीन पद देने से ये संकेत मिला कि विश्वास को लेकर अविश्वास बना हुआ है।

केजरीवाल इन संगीन और आर्थिक दुराचार के आरोपों पर भी खामोश हैं, जबकि मंदिर मार्ग थाने में प्राथमिकी दर्ज हो चुकी है। सवाल इससे दबाया नहीं जा सकता कि एक आरोपी दिवंगत है या जीवित है। केजरीवाल पर अपनी सरकार की सालगिरह मनाने वाले समारोह में 16,000 रुपए की भोजन की थाली परोसने के भी आरोप हैं। मानहानि के निजी मामले में उन्होंने प्रख्यात वकील राम जेठमलानी को तीन−चार करोड़ रुपए की फीस सरकारी कोष से दिलाई। आम आदमी पार्टी (आप) की अपनी वेबसाइट ही बंद कर दी गई है। ‘आप’ ने अपना वित्तीय हिसाब देना भी बंद कर दिया है। क्या शुंगलू कमेटी के आरोपिया निष्कर्ष गंभीर नहीं हैं?

ऐसा नहीं है कि केजरीवाल को अपने पसंदीदा मंत्री सत्येंद्र जैन की असलियत मालूम नहीं है। उनके खिलाफ मनी लांड्रिन्ग और हवाला कारोबार के गंभीर आरोप हैं। प्रवर्तन निदेशालय ने उनकी संपत्ति भी जब्त की है। क्या इतने सारे आरोपों और भ्रष्ट आचरण के बावजूद केजरीवाल ‘सत्यवादी हरिश्चंद्र’ बने रह सकते हैं? क्या अब भी वह खुद को मासूम और भोला, ईमानदार और पाक साफ मानते हैं? ऐसे सवालों के जवाब भी खुद केजरीवाल को देने होंगे। महज मानसिक संतुलन बिगड़ने और पूर्व मंत्री की बौखलाहट का उल्लेख करना ही पर्याप्त नहीं है। सभी को ‘चोर’ करार देने से ही केजरीवाल ‘दूध के धुले’ साबित नहीं हो सकते।

अरविंद केजरीवाल की धाक तो दिनों−दिन घट ही रही थी अब साख पर भी आंच आ गई, जो उनकी सबसे बड़ी पूंजी थी। दिल्ली विधानसभा चुनावों में धमाकेदार जीत और फिर नगर निगम चुनाव की शर्मनाक पराजय के बाद आम आदमी पार्टी में जो कुछ भी हो रहा है उसने इस पार्टी के चुनाव चिन्ह झाड़ू के अल्पायु होने वाली बात पर मुहर लगा दी है। केजरीवाल को अपने दामन पर पड़े धब्बों को धोना ही पड़ेगा। अब पार्टी के भीतर उनके खिलाफ तेज हवाएं चलने लगी हैं। वहीं जिस सोशल मीडिया पर केजरीवाल और उनकी ईमानदारी ‘महानायक’ हुआ करते थे, आज उसी पर वही आम आदमी थू−थू कर रहा है, मजाक उड़ा रहा है, जिसने केजरीवाल को सड़क से उठाकर मुख्यमंत्री के सिंहासन पर बिठाया था। जवाब केजरीवाल को ही देने हैं।

विपक्ष नैतिकता के आधार पर केजरीवाल के इस्तीफे की मांग कर रहा है। हमाम में सभी नंगे हैं। भाजपा और कांग्रेस के नेता भी कई दफा नैतिकता की परीक्षा में फेल साबित हुये हैं। ऐसे में केजरीवाल के इस्तीफे की बात विशु़द्ध तौर पर राजनीति से प्रेरित लगती है। कपिल मिश्रा ने दिल्ली के उपराज्यपाल सहित सीबीआई में मामले की शिकायत की है। वो तमाम सबूतों के साथ वह ‘गवाह’ बनना चाहते हं। सवाल है कि यदि सीबीआई ने प्राथमिक जांच दर्ज कर ली और प्रवर्तन निदेशालय की जंजीरें सत्येंद्र जैन तक पहुंच गईं, तो न केवल केजरीवाल का कॅरियर दागदार होगा, बल्कि ‘आप’ भी बिखरने के मुहाने तक आ सकती है। आरोप चारों ओर से बौछार कर रहे हैं। क्या केजरीवाल चुप रहकर यह साबित करना चाहते हैं कि वह नापाक नहीं हैं? देश की जनता को केजरीवाल से काफी उम्मीदें थीं। राजनीतिक घटाटोप में आम आदमी पार्टी किसी प्रकाश की भांति सामने आयी थी। केजरीवाल की चुप्पी और उन पर लगे भ्रष्टाचार के आरोप आम आदमी की उम्मीदों, संभावनाओं और विश्वास पर पानी फेरने का काम कर सकते हैं। लोकतंत्र और राजनीति में शुचिता की बात करने वाले केजरीवाल पर देश की जनता के विश्वास को बनाये रखने की बड़ी जिम्मेदारी है।

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