फैशन के दौर में ढीले पड़े बुनाई के फंदे

लखनऊ। दौर था जब घरेलू महिलाओं  के लिए सदी की दोपहर का मतलब गुनगुनी दोपहर में मूंगफली खाते हुए परिवार के लोगों के लिए उन के साथ सिलाई से गर्म कपडे बुनना होता था। उन और सिलाई से गर्म कपडे बुनती मांए नाप लेने के बहाने से सही अपने बच्चों को बढते हुए बचपन को देखकर उनके लिए कपडों के साथ सपने भी बुन लिया करती थी। कितने ही मधुर सबंधों की नींव सिलाई के फंदों के साथ ही पड जाती थी। सिर्फ घरेलूूू ही नहीं बल्कि टीवी के कितने ही कार्यक्रमों में सरकारी कामकाजी महिलाओं को व्यंग के तौर पर स्वेटर बुनते हुए दिखाया जाता था। लेकिन बदलते समय के साथ ही महिलाओं  में हाथ के बने हुए उन के कपड़ो बनाने का चलन कम होता दिखाई दे रहा है और आज हर वर्ग के लोग घर में बुने हुए गर्म कपडों के स्थान पर रेडिमेड कपड़ो को तरहीज दे रहे है। फिर वजह चाहे तेज भागती जिंदगी में सिलाई बुनाई के लिए समय ना मिलना हो या हर फैशन और दिखावे के मामले में रेडिमेड वूलन कपडों के सामने घर के बुने हुए कपडों का पिछडना। कारण जो भी हो लेकिन सच्चाई यही है कि घर के बने उनी कपडे और उन्हे बनाने वाली सिलाई दोनों ही अपने वजूद के लिए लड़ाई लड़़ रहे हैं।  समय के साथ बदला लोगों का नजरिया एक दौर था जब घर के लिए बहू चुनते समय लोग गृहकार्य में दक्ष और सिलाई कढाई जानने वाली लड़की को चुनते थे। लेकिन आज के दौर में पैसे को तरजीह देने के कारण इन गुणों के स्थान पर लोग कमाउ बहुओ को प्राथमिकता देने लगे हैं। साथ ही कैरियर संवेदी मानसिकता के दौर में लड़किया भी घरेलू कामकाज और परिवारयोपयोगी कलाओं को पिछडेपन की निशानी मानती हैं और उन्हे अपनी शन के खिलाफ समझते हैं।  संयुक्त परिवार टूटना भी एक वजह  संयुक्त परिवारों में घर की महिलाओं पर खाने पीने के अलावा घर के दूसरे कामों की जिम्मेदारी भी होती थी। चाहे वो घर की नई बहूओं को खाने पीने की विधियां सिखाना हो या सिलाई बुनाई की कलाएं सिखाना। लेकिन आज के टू बैडरूम फलैट कल्चर वाले परिवारों मेें नई बहू को सिखाने की जिम्मेदारी सिर्फ टीवी की ही रह गई है। जिसमेें सिलाई बुनाने के लिए पर्याप्त समय नह

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