धार्मिक मान्यताओं के अनुसार हर व्रत और त्योहारों की अपनी महत्ता होती है, आज वैज्ञानिकता को महत्व देने वाले लोग भी हमारे त्योहारों व व्रतों की महत्ता को स्वीकार करने लगे हैं। हमारी सोच से ऊपर उठकर ऋषि – महर्षियों ने जिन सोचों के साथ इन पर्वों को आरंभ कराया, आज उसकी प्रमाणिकता व प्रासंगिकता सर्वविदित है।

Chhath Puja
Chhath Puja

आज प्राकृतिक पदार्थों के दोहन के कारण प्रकृति में भी तेजी से बदलाव हो रहा है और इसके दुष्परिणाम भी हमें समय समय पर प्राकृतिक आपदाओं के रूप में देखने को मिलते हैं। जिस स्वच्छता और पर्यावरण की सुरक्षा हेतु आज पूरा देश आन्दोलन के रूप में कार्यक्रमों का संचालन कर रहा है, उसे हमारे ऋषि मुनियों ने काफी पहले समझ कर पर्वों के रूप में स्थापित कर दिया था ताकि जनमानस प्रकृति को समझकर उसके अनुरूप चल सके।

शुद्ध और शान्त वातावरण हेतु ही ऋषि मुनियों ने अपने आश्रम जंगलों और नदियों के आसपास बनाया। पर्यावरण सुरक्षा हेतु हमें प्रकृति के साथ मिलकर चलना होगा और प्राकृतिक संसाधनों के दुरुपयोग पर रोक लगानी होगी। छठ पर्व को आज महापर्व के रूप में पूरे बिहार पूर्वांचल सहित देश के अधिकांश हिस्सों में मनाया जा रहा है।

सुहागन स्त्रियों द्वारा कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाए जाने वाले प्रत्यक्ष देव सूर्य की उपासना का यह महापर्व का हमारे पर्यावरण व विज्ञान से गहरा रिश्ता है। यह पर्व हमें जन, जल, जमीन व जलवायु के उचित प्रबंधन के साथ ही साथ उसकी वैज्ञानिकता की भी पुष्टि करता है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सामाजिक व सांस्कृतिक विविधता के मध्य प्रत्यक्ष देखने वाले एकमात्र देव सूर्य देव की उपासना का महापर्व हमें समाज व पूरे परिवार के साथ जोड़ने में मदद करता है, साथ ही साथ हमें प्राकृतिक संसाधनों व पेड़ पौधों के बेहतर उपयोग व उत्पादन की भी प्रेरणा देता है।

पृथ्वी,आकाश,वायु,अग्नि तथा जल जैसे पंचमहाभूत तत्वों से ही प्रकृति का निर्माण होता है, जिससे समस्त जीव व वनस्पतियों को जीवन व पोषण मिलता है। अतः जीवन रक्षा हेतु प्रकृति की रक्षा आवश्यक है। कहा गया है कि भगवान शब्द की उत्पत्ति इन्हीं पंचमहाभूतों के आधार पर की गई है।

भगवान शब्द में भ से भूमि, ग से गगन, व से वायु और अ से अग्नि और न से नीर का बोध होता है। जो इन पंचमहाभूतों को साम्यावस्था में अपने में समाहित कर लेता है वही भगवान बन जाता है।यह ऐसा पर्व है जो हमें सीधे सीधे प्रकृति से जोड़ पर्यावरण सुरक्षा की सीख देता है।

तालाबों, पोखरों, नदियों की साफ सफाई के साथ उनके किनारों,घाटों व आसपास की जमीन की सफाई कर श्रद्धालु और उनके परिजन इस महापर्व की शुरुआत जमीन से जुड़कर प्रारंभ करते हैं। सामाजिक व पारिवारिक बिखराव के मध्य सांस्कृतिक विविधता में एकता, सामूहिकता, मेल जोल व भाईचारे को बढ़ावा देने तथा एक साथ मिल जुल कर रहने की सीख देता है।

दूरदराज के क्षेत्रों में नौकरी पेशा करने वाले लोग भी इस पर्व के मौके पर अपने परिवार के साथ मिलजुल कर मनानेे हेेेतु घर आते हैं। लोग जमीन की सफाई के बाद तालाब, पोखरा, जलाशय व नदियों की सफाई कर वहां बेदियां तैयार करते हैंं। यह पर्व हमें जल भंडारण,जल संरक्षण व उनके उपयोग की सीख देता है।

दीपावली बिताते ही लोग नदियों,पोखरों,जलाशयों व तालाबों के आसपास से कूड़ा कचरा व गंदगी हटाकर आसपास की भूमि को साफ-सुथरा कर जलाशय, नदियों को भी साफ सुथरा करते हैं ताकि व्रती महिलाओं को किसी प्रकार की असुविधा न हो।

इसके भीतर भी वैज्ञानिकता व प्रमाणिकता छिपी है कि जब नदियों के आसपास का क्षेत्र साफ हो जाएगा तो अनावश्यक कूड़ा कचरा नदियों में प्रवाहित नहीं होगा तथा जल की अशुद्धियां सूर्य की किरणों के प्रभाव से दूर होंगी और हानिकारक जीवाणुओं का भी नाश हो जाएगा।

प्रसाद के रूप में छठ पर्व में हमें प्रकृति प्रदत्त फल फूलों की आवश्यकता होती है जो हमें तभी प्राप्त हो पाएंगे जब हम बाग-बगीचों की उचित देखरेख और रखरखाव करेंंगे। यदि वृक्षारोपण कर उनकी नियमित देख रेख नहीं होगी तो हमें न तो सात्विक भोजन सामग्री प्राप्त हो पाएगी न ही हमें शुद्ध वायु प्राप्त होगी।

इस प्रकार यह पर्व हमें वृक्षारोपण और उनकी उचित देखभाल के की सीख देता है।जब वृक्ष व वनस्पतियां प्राकृतिक रूप में उपलब्ध रहेंगे तो हमें उनसे प्राप्त फल व अन्य सामग्री के साथ ही साथ शुद्ध वायु भी प्राप्त होती रहेगी जो हमारे जीवन का आधार है। प्रकृति प्रदत्त भोज्य पदार्थों के उपयोग से एक तरफ जहां शरीर स्वस्थ रहता है वही मन मस्तिष्क भी चैतन्य होता है।

Chhath Puja
Chhath Puja

वैज्ञानिक दृष्टिकोण के अनुसार व्रत से शरीर में एकत्रित विजातीय पदार्थों के बाहर निकलने से अंतःकरण की शुद्धि होती है, शरीर में शुद्धता और धैर्य आता है। व्रती महिलाओं द्वारा कई दिनों पूर्व से ही सात्विक और प्राकृतिक सुपाच्य भोजन ग्रहण किया जाता है और प्रसाद में भी प्राकृतिक पदार्थों की ही अधिकता होती है जो शुद्ध होने के साथ ही साथ लाभप्रद भी होते हैं।

गर्मी के मौसम के समापन और शीतकाल के आगमन की बेला में मनाए जाने वाले इस पर्व में व्रती महिलाओं द्वारा जल में खड़ा होकर अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है जिससे सूर्य से निकले पराबैगनी रश्मियों का दुष्प्रभाव कम होता है तो वही दूसरे दिन उषाकाल में उदयगामी सूर्य को अर्घ्य देकर सूर्य से निकली पराबैगनी रश्मियों से सुरक्षा व विटामिन डी की प्राप्ति होती है।

हमारे धर्म शास्त्रों के अनुसार शीतकाल में सूर्योदय से पूर्व स्नान कर सूर्य नमस्कार करने व धूप सेंकने से दिनभर ताजगी की अनुभूति होती है। सामाजिक व संस्कारिक स्तर पर सांध्य बेला में अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देना यह दर्शाता है कि हमें उनको भी आदर और सम्मान देना चाहिए जिन्होंने अपना सारा समय दूसरों को अर्पित कर दिया और अपने जीवन के अंतिम पड़ाव पर हैं अर्थात हमें अपने बुजुर्गों का भी पूर्ण सम्मान कर सहयोग लेना चाहिए।

प्रातः नवोदित सूर्य को दिया गया अर्घ्य यह दर्शाता है कि जिस प्रकार प्रत्यक्ष देव सूर्य प्रतिदिन उषाकाल में उदित होकर अपनी असीम ऊर्जा के साथ प्रकृति को पोषण व ऊष्मा प्रदान करते हैं उसी प्रकार हमें उनसे प्रेरणा लेकर परोपकारी भाव से कार्य शील होना चाहिए। यह पर्व हमेेंं प्रकृति के नजदीक लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

यह पर्व हमें जल, जमीन, जलवायु को साफ रखने व प्रकृति प्रदत्त भोज्य पदार्थों के सदुपयोग करने तथा समाज और परिवार के साथ सद्भाव पूर्वक मिलकर एक साथ रहने की प्रेरणा देता है। इस पर्व के लिए हम प्रकृति व पर्यावरण संरक्षण का जो कार्य वर्ष मेेंं एक सप्ताह करते हैं यदि उसे हम अपनी दिनचर्या में शामिल कर लें तो एक तरफ जहां प्रकृति व पर्यावरण का पोषण होगा ,वहीं दूसरी तरफ हमारा जीवन भी स्वस्थ्य रहेगा।