सौरभ भट्ट 

CHILD LABOUR
CHILD LABOUR

आज देश की जो दुर्दशा हो रही है, उसका भ्रष्ट राजनीतिक तंत्र ही जिम्मेदार है। 77 प्रतिशत आबादी इस मुल्क की अति गरीब है, जिसकी जिन्दगी मात्र औसतन आमदनी 20 रूपये रोज पर टिकी है। जरा गौर करें! इन गरीबों के घरों में पैदा होने वाला बच्चा कैसा भाग्य लेकर पैदा होता है? उसका भाग्य यही होता है कि वह खेलने, कूदने, पढऩे, लिखने वाली उम्र में ही अपने पापी पेट के लिए गन्दगी के ढेरों में जाकर कबाड़ बीने या किसी का घरेलू नौकर बने या फिर बड़े लोगों के जूतों को साफ करें, उनमें पालिश करे और तिरस्कार की जिन्दगी जिए। इस प्रकार निश्चित है कि एक दिन उसको अपने आप से, समाज से घृणा पैदा होगी और तब वह निश्चित है कि नक्सली बनेगा, माओवादी बनेगा या फिर आतंकवादी बनेगा। क्या आप मुल्क की इस बहुत बड़ी आबादी से उम्मीद करते हैं कि ये उपदेशों के सहारे अपनी जिन्दगी तिरस्कार और अपमान में इस प्रकार से गुजार कर राष्ट्र की मुख्यधारा से जुड़े रहेंगे।

जब हमारा देश आजाद हुआ था तो उस समय हमारे देश के खजाने में 33 करोड़ रूपये का कोष था, और आज? दोस्त! जैसा कि सरकारी ऑकड़े बताते हैं कि आज इस मुल्क में जो कर्जा है उसका औसत यहॉं की आबादी के हिसाब से 15 हजार रूपये प्रति व्यक्ति है। इस मुल्क के हुक्मरानों ने अंग्रेजों से शासन अपने हाथ में लेने के बाद क्या किया? केवल देश को बेचा। हमसे दो साल बाद चाईना आजाद हुआ था। हम 1947 ई0 में आजाद हुए थे। चाईना 1949 ई0 में आजाद हुआ था, लेकिन वह आज एशिया की महाशक्ति बन गया है। उसकी ताकत से अमेरिका की भी रूह कॉपती है। एक हम है कि हमको दुनिया के सारे मुल्क बेवकूफ व डरपोक समझते हैं। पिद्दी भर का पाकिस्तान जब गुर्राता है तब हम मिमियाने लगते हैं।

हमारे दो सैनिकों का सिर काट कर ले गये और हम आज तक कुछ नहीं कर पाये हैं। भारतीय मछुआरों की निर्मम हत्या करने वाले इटली के दो सैनिक हमें ठेंगा दिखाकर अपने मुल्क चले गए। इटली सरकार ने भी हमारी औकात को जानते हुए उल्टा हमीं से गुर्राना शुरू कर दिया है। आज दुनिया के सामने हमें इज्जत बचाना मुश्किल है। देश अपने आप में शर्मसार है। आज देश अपने भाग्य पर रो रहा है। वहीं दूसरी तरफ सुप्रीमकोर्ट के सख्त आदेशों के बावजूद भी आज तक देश के नौनिहालों का शोषण बन्द नहीं हो सका तथा आयेदिन दिन-दूनी-रात-चौगुनी के हिसाब से बाल श्रमिकों का शोषण बढ़ता ही जा रहा है।

वैसे तो बालकों के विकास के लिए शासन अनेक प्रकार की कल्याणकारी योजनायें लागू करके यह दावा करता है कि हम इन योजनाओं के जरिये बालकों का सर्वांगीण विकास कर रहे हैं, जिससे देश के ये अबोध बालक सुनागरिक बनें क्योंकि यही नौनिहाल राष्ट्र के भविष्य व कर्णधार होते हैं। गरीबों के बच्चों को शिक्षा दिलाने के लिए बाल श्रमिक विद्यालय का संचालन प्रत्येक ब्लाक, गॉवों व कस्बों में हो रहा है, और प्रत्येक सेन्टर का खर्च भारत सरकार प्रतिमाह वितरण करती है। इस विद्यालय की तरफ से प्रत्येक बच्चे को नास्ता, भोजन, ड्रेस, कापी, किताबें, वजीफा आदि देती है, लेकिन यह जाता कहॉं है?

केवल कागजी खानापूर्ति करके सामाजिक संस्थायें उच्च अधिकारियों की मिली-भगत से बाल श्रमिक विद्यालय का सारा धन डकार जाती हैं। बाल विकास पुष्टाहार निदेशालय द्वारा प्रत्येक गॉवों में किशोरी सशक्तीकरण बाल पुष्टाहार दिया जा रहा है। बच्चों के इस बाल पुष्टाहार के एक बोरी की कीमत लगभग 1000 रूपया है, जिसको देश से बच्चों के विकास के लिए प्रदान किया जाता है, फिर बच्चों को यह पुष्टाहार न मिलकर गली-कूचों में बेचकर अपनी जेबों को गरम करके जानवरों का निवाला बना दिया जाता है। आज श्रमिकों के बढऩे व शिक्षा के प्रति जागरूक न होने का प्रमुख कारण देश में गरीबी का चरम सीमा पर होना भी है।

वर्तमान समय में गरीबी इतनी बढ़ गयी है, कि कुछ लोगों के पास खाने के लिए दो-जून की रोटी और रहने के लिए घर तक नहीं है। ऐसे में यह गरीब भला किस प्रकार से शिक्षा दिलायें। एक अह्म सवाल उठता है कि मजबूर ये अभिभावक न चाहते हुए भी अपनी विरासत में मिली हुई गरीबी के कारण अपने बच्चों को मजदूरी कराने पर बाध्य होते हैं। वैसे तो सरकार इन गरीबों के उत्थान के लिए अनेक प्रकार के उपाय कर रही है, लेकिन चारों तरफ व्याप्त भ्रष्टाचार होने के कारण इन पात्र लोगों को लाभ नहीं मिल पा रहा है। जब ये गरीब अपने दो-जून की रोटी के लिए विवश हैं, तो ऐसे में किस प्रकार की शिक्षा दे पायेंगे? यह भी शासन को सोचना होगा।

वेसे तो सरकार दावा करती है कि गरीबी समाप्त हो रही है, लेकिन अगर सही मायने में आंकलन किया जाये तो अभी लगभग 75 प्रतिशत से ज्यादा गरीब हैं। आयेदिन समाचार पत्रों में पढऩे को मिलता है, कि बेहद गरीबी से तंग आकर अमुक पुरूष/महिला ने आत्महत्या कर लिया है। इस प्रकार जब तक इस तथ्य पर गहन विचार करके ध्यान नहीं दिया जायेगा व गरीबी दूर करने के कठोर से कठोर कदम नहीं उठाये गये, तो शायद बाल श्रम को रोकने में असफल ही रहेंगे और बालश्रम नामक अपराध इसी तरीके से चलता रहेगा। जो देश के लिए भविष्य में घातक सिद्ध होगा। स्वास्थ्य निदेशालय जच्चा की सुरक्षा के लिए मॉ के गर्भ से जन्म लेने के बाद तक बच्चों के विकास के लिए भारत सरकार तमाम प्रोत्साहन राशि देती है, लेकिन फिर भी बच्चा वहीं का वहीं रह जाता है।

आज देश में बालकों के विकास के लिए विभिन्न प्रकार की योजनाओं तथा अभिभावकों के उदासीनता के कारण भारत के इन नौनिहालों को दुर्दशा के शिकार होकर बालश्रमिक जैसे अपराध के चक्कर में पडऩा पड़ रहा है, जिससे उनका जीवन सुखमय व्यतीत हो। ये बालक होटलों, मोटर वर्कशॉपों, ईंट के भ_ों तथा सार्वजनिक स्थलों पर देखे जा सकते हैं। बाल श्रम के अपराध के बढऩे का कारण देश में अधिक मात्रा में लोगों का अशिक्षित होना भी है। यदि सही ढंग से आंकलन किया जाये तो अब भी अधिक से अधिक मात्रा में बालकों के मॉ-बाप ज्यादा मात्रा में अशिक्षित ही मिलेंगे। जिनकी नजर में शिक्षा कोई मायने नहीं रखती। जिस पर से उनकी जीविका चले वही उनके लिए उत्तम है।

इस प्रकार जब माता-पिता ही अज्ञान हैं, तो बच्चे कैसे महान वाली कहावत चरितार्थ होकर बालश्रम को बढ़ावा देती है। आज देश को आजाद हुए 65 वर्ष पूरे हो गये, लेकिन हालत जैसी की तैसी ही बनी हुई है। गरीब बेचारा तो गरीब ही होता जा रहा है। ऐसे हालात में यह सवाल उठता है कि आखिर कब बालश्रम उन्मूलन होगा? मानव अपनी रोजी-रोटी चलाने के चक्कर में अपने धन्धे में अपेन ही पुत्र का समायोजन व बालकों से किसी अन्य जगह नौकरी करवाता है, जिससे बालश्रमिकों की संख्या बढ़ती ही जाती है। पीढ़ी-दर-पीढ़ी यही कार्यक्रम चला करता है, शायद यही बालश्रम को बढ़ावा देता है।

आज चाईना ने हमारी एक लाख वर्ग किमी0 से ज्यादा जमीन हथिया ली है, लेकिन देश के हुक्मरानों को जरा-सा भी अफसोस नहीं आ रही है। आज इस मुल्क में 77 प्रतिशत व्यक्ति भुखमरी व गरीबी से त्रस्त हैं और हुक्मरान देश का जमीर बेचकर अपनी अमीरी में मस्त हैं। बताते हैं कि वर्तमान केन्द्र सरकार ने दिल्ली में ही अपने इस कार्यकाल के तीन वर्ष पूरे होने के अवसर पर जनसेवकों के भोज की व्यवस्था की थी, जिसके खर्च के सरकारी ऑकड़े बताते हैं कि इस भोज में एक प्लेट भोजन की कीमत 8 हजार रूपये थी। जरा गौर करें! यह वह मुल्क है जहॉं 3 हजार बच्चे प्रतिदिन पोषण आहार की कमी के कारण मर रहे हैं। 30 करोड़ से अधिक लोग भूखे पेट ही सोने पर मजबूर हैं। विदेशी जो लूटकर ले गये, वो तो ले गए, आज हमारे देशी हुक्मरान ही देश को लूट कर विदेश लिए जा रहे हैं।

जरा! आप ही बताइये, कि इनको क्या सजा दी जाये? जरा चिन्तन करिए फिर जवाब दीजिए। जल्दबाजी ठीक नहीं, क्योंकि यह हुक्मरान ही तो हमारे देश के आदरण्ीाय हैं। सौ साल अंग्रेजों को झेला है तो सौ साल इनको भी झेल लीजिए। फिर बताइये कि क्या विकल्प है? इतिहास बताता है कि शोषक का हृदय कभी परिवर्तित नहीं होता है। भूखे, नंगे, बेघर आज इसी वजह से नक्सलवादी होने के लिए मजबूर हैं। आज जनता की सेवा के लिए सत्ता में आ रहे नेता रेजीडेंसी व ताज होटल में प्रेस-कान्फ्रेंस करते हैं। इस मुल्क की बहुत बड़ी आबादी दुखी व गम में जीवन बिता रही है। इस इस मुल्क में ”सर्वाइवल ऑफ दि फिटेस्ट” का कानून लागू है।

आज इस मुल्क के हुक्मरानों को कौन समझाये? कि राष्ट्र के लिए जीना सीख लें तो निश्चित है कि इनके आचरण स्वयं उत्कृष्ट हो जायेंगे। गरीबों के लिए बस एक ही उपाय है कि जाति-धर्म, सम्प्रदाय को भूलकर एक हो जायें। शोषकों से मत घबरायें, क्योंकि गरीबों के पास खोने के लिए गरीबी के सिवा कुछ भी तो नहीं है। आर्थिक गुलामी, मानसिक गुलामी दोनों बहुत ही खतरनाक हैं और इनसे भी अधिक खतरनाक गरीबों की गुलाम मानसिकता है। किसी ने ठीक ही कहा है कि अति होने पर सौगन्ध टूटती है, इंकलाब होता है। योगीराज श्रीकृष्ण जी ने भी प्रण किया था कि वह शस्त्र नहीं उठायेंगे, केवल सारथी बने रहेंगे, लेकिन अति होने पर उन्हें भी चक्र चलाना पड़ा। इसलिए इस मुल्क के गरीबों के लिए भी आवश्यक है कि समाज व राष्ट्रहित को ध्यान में रखकर अपनी आने वाली पीढिय़ों के लिए जागरूक हो जायें और लक्ष्य पाने के लिए अवश्य संगठित हो जायें।