विमल शंकर झा

देश का पेट भरने वाले किसान को शुरु से सियासत और वोट बैंक के नजरिए से देखे जाने की राजनीतिक दलों की खुदगर्ज मानसिकता के कारण के कारण वह उपेक्षित और शोषित है।

यह विडंबना ही है कि किसानों के लिए आजादी के बाद से ही पचासों योजनाएं चल रही हैं लेकिन उनकी स्थिति आज भी दयनीय और दारुण बनी हुई है। इसका प्रमाण देश में पिछले पंद्रह बीस सालों में लाखों किसानों द्वारा खुदकुशी किया जाना है। छत्तीसगढ़ में यह आंकड़ा दस हजार पार कर चुका है।

from famine drought faces awaiting relief splatter

कड़कड़ाती ठंड, मूसलाधार बरसात और चिलचिलाती धूप में हाड़तोड़ मेहनत कर देश को अन्न खिलाने वाले अन्नदाता की इस दयनीय हालत के लिए ऊपर वाले भगवान के साथ नीचे वाले भगवान भी जिम्मेदार हैं।

इंद्रदेव के रुठ जाने से मानसून के दगा देने पर किसानों को अकाल की विभीषिका का सामना करना पड़ता है। और सरकार की उपेक्षा दुकाल में उनकी हालत दुबले पर दो आषाढ़ जैसी हो जाती है। सरकार की इस गरीब पर दोहरी मार पड़ती है। एक तो किसानों के नाम पर बहुतेरी योजनाओं पर समय पर और संजीदगी से अमल नहीं होता।

दूसरा योजनाओं की राशि के सरकारी मुलाजिमों और सत्ता से जुड़े लोगों की बंटरबांट पर कोई अंकुश नहीं लग पाया है। यानी सरकार की नीति और नीयत में खोट के कारण ही किसानों की तकदीर और तस्वीर नहीं बदल पाई है। धान का कटोरा के नाम से प्रसिद्ध छत्तीसगढ़ इस साल अकाल की चपेट में है।

अनावृष्टि और अल्प वर्षा के कारण सूखे और कर्ज से किसानों की खुदकुशी के आंकड़े बढ़ते जा रहे हैं। डेढ़ महीने पहले रमन सरकार राज्य की नब्बे तहसीलों को सूखाग्रस्त घोषित कर चुकी हैं लेकिन अब तक केंद्र सरकार ने राहत राशि भेजी है और न ही राज्य सरकार ही इस मामले में गंभीर नजर आ रही है।

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आनावरी नजरी आंकलन रिपोर्ट पर ध्यान देने और किसानों को मुआवजा राशि और राहत उपायों की कोई कार्य योजना अब तक घोषित नहीं किए जाने से किसान चिंतित हैं। क्या सरकार को नहीं मालूम कि जल्द ही राहत उपाय नहींं किए गए तो निस्तारी, पशुओं के चारे और रोजगार की कैसी विकट समस्या गहराएगी।

रायपुर आए केंद्रीय पंचायत और ग्रामीण विकास मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने मीडिया के पूछे जानेे पर सूखे के हर प्रस्ताव को केंद्र के मंजूरी देने की बात कही है। सूखे के दो महीने बाद भी राज्य व केंद्र सरकार इस संजीदा मामले में गंभीर नहीं है। जबकि मनरेगा के तहत 2 सौ दिन काम चलाने की मांग की जा रही है।

एक तरफ तो सरकार राहत पैकेज के प्रयासों में सुस्ती दिखा रही है दूसरी तरफ चुनावी लाभ के लिए बोनस तिहार और राज्योत्सव में मस्त है। अब तो पूरी सरकार और संगठन अपने मंत्री पर लगे सेक्स सीडी के कलंक को मिटाने में पसीना बहा रही है।

यह तो ऐसा ही हुआ कि जब रोम चल रहा था तब नीरो बांसुरी बजा रहा था। वोट बैंक पुख्ता करने बोनस तिहार पर सरकार जो करोड़ों रुपए खर्च कर रही है यदि वही पैसा किसानों पर खर्च करती तो कितने ही अकाल पीडि़तों की रोजी रोटी, शादी ब्याह और कर्ज से के तनाव कर्ज की कुछ चिंता दूर होती।

कांग्रेस और किसानों के आंदोलन के बाद भी देश दुनिया की क्षुधा शांत करने वाले इस मेहनतकश और मुफलिस तबके को समर्थन मूल्य तो दूर बोनस भी दो साल की बजाए महज एक साल का ही दिया जा रहा है।

इतना ही नहीं बोनस का लाभ भी सभी किसानों को भी नहीं मिल रहा है। क्या आधे अधूरे किसानों को पंद्रह बीस हजार बोनस मिलने से उनकी सभी समस्याओं का समाधान हो जाएगा ? क्या यही सरकार की गांव, गरीब और किसान की नीति और नीयत है ? यह कैसा सबका साथ सबका विकास है ? क्या व्यवस्था के रहनुमाओं को नहीं मालूम कि जल्द ही राहत पैकेज रिलीज नहीं किया गया और गांवों में रोजगार और चारे पानी का प्रबंध नहीं किया गया तो किस तरह हाहाकार मच जाएगा।

क्योंकि सूखे से न मवेशियों के लिए चारा है और न ही जलाशयों में पर्याप्त पानी ही है। रबी फसल की चिंता किसानों को अलग सताए जा रही है। राज्य में कलेक्टर जनदर्शनों में किसानों के जल स्तर सूखने और राहत कार्ययोजना लागू करने के संज्ञान में लाए जाने के बाद भी अब तक किसी तालाब और निजी बोरिंग आदि जलस्रोतों को आरक्षित किए जाने की जहमत नहीं उठाई गई है।

सूखे के चलते जल्द ही पलायन का सिलसिला शुरु हो जाएगा। ग्रामीण अंचल में किसानों को बची खुची फसल कटाई का इंतजार है। इसके बाद पलायन का दर्दनाक सिलसिला शुरु हो जाएगा। गांवों में मड़ई होते ही किसान बुजुगों और अपने जानवरों को घरों में छोड़कर कमाने खाने निकल जाएंगे। सूखे के चलते इस साल पलायन का आंकड़ा लाखों में पहुंच जाने के आसार हैं।

यह विडंबना ही है कि छत्तीसगढ़ राज्य के गठन के सोलह साल बाद भी हर साल तीन लाख से अधिक ग्रामीण यूपी दिल्ली और दीगर राज्यों में काम की तलाश में जाते हैं। यह तब है जब सरकार राज्य के सबसे तेजी से विकास करने का दावा करती है। सौ टके का सवाल है जब गगनचुंबी विकास हो रहा है तो लाखों मे साल दर साल यह पलायन क्यों ? किसान और खेती के लिए बहुप्रचारित योजनाएं सोलह साल से चल रही रही हैं तो फिर किसान खुदकुशी क्यों कर रहे हैं।

राज्य में अब तक दस हजार से अधिक किसान आत्महत्या कर चुके हैं। आए दिन एक दो किसानों के खुदकुशी की खबर मीडिया में आ रही है। सीएम हाउस से लेकर कलेक्टोरेट तक में किसान आत्महत्या कर रहे हैं। मगर सरकार के रहनुमाओं की संवेदना नहीं पसीज रही है।

गरीबी और कर्ज से मरने वाले इन किसानों को सरकार के नुमाइंदे शराब पीकर मरना बताते हैं या फिर पीएम में उनके पेट में दाना बता देते हैं। यानी उनकी मौत भूख से नहीं होती। किसानों को दो तरफा नुकसान हो रहा है। एक तरफ तो राज्य में औद्योगिकरण और कांक्रीटीकरण का ग्राफ बढऩे से खेती का रकबा लगातार कम होता जा रही है वहीं दूसरी ओर कृषि व्यवसाय के महंगे होने और ङ्क्षसचाई के संसाधन पर्याप्त नहीं होने और उनका जीवन स्तर सुधारने सरकार की सुस्ती से वे मुफलिसी का जीवन जी रहे हैं।

कांग्रेस ने दो साल पहले विधानसभा में राज्य में पावर प्लांट और सीमेंट कारखानों आदि उद्योगों के विस्तार से दो लाख हेक्टेयर कृषि रकबा कम होने पर हंगामा बरपाया था। चांपा जांजगीर में अंध औद्योगिकरण और रोगदा बांध इस बात का उदाहरण है कि कृषि और किसान के हितों को लेकर सरकार कितनी गंभीर है।

राज्य बनने के बाद छत्तीसगढ़ में एक बड़ी समस्या जो विकराल रुप लेती जा रही है वह यह है कि अन्य वर्गों की बजाए ग्रामीण यानी किसानों और खेतिहर मजदूर तबकों में शराबनोशी बढ़ती जा रही है। इसकी वजह गरीबों को उनकी भूख मिटाने के नाम पर वोट बैंक के लिए फ्री में दिया जा रहा चावल है। दस- पंद्रह साल पहले खेतों में काम करने जाने वाले वाले लाखों खेतिहर मजदूर अब खालीपीली बैठ अलसुबह से देर रात तक शराब में मदमस्त होकर घर से चौपाल तक कोहराम मचाए हुए है। चावल बेचकर कई शराब पी रहे हैं।

मजदूर नहीं मिलने से किसान अपने खेत औन पौने दाम पर रेग पर दे रहे हैं। शराबनोशी बढऩे का दूसरा बड़ा कारण जमीन के रेट बढऩे से यह रियल स्टेट के गिद्धों की भेंट चढ़ रहे हैं। बिल्डरों के लालच में आकर किसान अपनी जमीनें बेच रहे हैं। रियल इस्टेट के इस कारोबार में कितने ही राजनीतिकों और अधिकारियों की ब्लैक मनी लगी हुई है। अब हो जमीन बिकने के बाद किसानों के बच्चे पुरखों की जमीन का यह पैसा लंबी चौड़ी गाड़ी खरीद कर शरानोशी जैसी मौज मस्ती में बर्बाद कर रहे हैं।

बिहार में शराबबंदी के बाद भी बिहार को कोसने वाली सरकार यहां शराबखोरी को वोट बैंक के लिए बढ़ावा देकर अब खुद ही शराब बेचने का नेक काम कर रही है। शराब से नई पीढ़ी और कितने घर बर्बाद हो रहे, हत्या, दुर्घटनाएं और मेडिकल का समाज और सरकार का किस कदर बजट बढ़ रहा है, विकास और संस्कृति के झंडाबरदारों को इसकी सोचने की फुरसत आखिर क्यों नहीं है। क्या यही नया छत्तीसगढ़ और नवा बिहान है।

पंद्रह साल से सत्ता में काबिज देश में सबसे तेज विकास का दावा करने वाली भाजपा सरकार के पास किसानों के इस यक्ष प्रश्न का कोई जवाब नहीं है कि अरबों की लोकलुभावन बहुप्रचारित योजनाओं के बाद भी उनकी दुर्दशा क्यों है। उनकी आय इतनी क्यों नहीं है कि वे अपने परिवार का भरणपोषण, शिक्षा, और शादी ब्याह कर सम्मान से जीवन बिता सकें और खुदकुशी न करना पड़े ।