डॉ दिलीप अग्निहोत्री

पद्मावती के निर्देशक संजय लीला भंसाली (Sanjay Leela Bhansali) की मासूमियत इस समय देखने लायक है। गम्भीर मुद्रा में वह नसीहत देते है। पहले फ़िल्म देख लीजिए, फिर फैसला करिए। लेकिन उनके पास इस बात का जबाब नहीं है कि इस फ़िल्म के विवादित दृश्य ही सामने क्यों लाये गए। दूसरा यह कि सेंसर बोर्ड के सर्टिफिकेट के बिना कुछ लोगों को फ़िल्म दिखाना कितना उचित था। जिन्हें परेशानी है, उन्हें नहीं दिखाया गया ।

The mischief of Sanjay Leela Bhansali
The mischief of Sanjay Leela Bhansali

जिन्हें दिक्कत नहीं थी, उन्हें दिखाया। वह गुणगान करने लगें। इस रहस्य से भी पर्दा हटाना चाहिए। फ़िल्म रिलीज होने से बहुत पहले दो बात चर्चा में आ गई। एक तो पर्दे पर पद्मनी बनी दीपिका पादुकोण का नाच, दूसरी चर्चा यह चली की इसमें अलाउद्दीन खिलजी को अच्छा शासक बताया गया। विवाद को हवा देने के लिए ये दोनों मसले ही पर्याप्त थे। ऐसे में यह क्यों न माना जाए कि संजय लीला भंसाली ने सोची समझी रणनीति के तहत किया। विवाद उतपन्न करना उनका मकसद था।

फ़िल्म के प्रचार को यह रास्ता चुना गया। इसके लिए फ़िल्म बनाने वालों ने इतिहास से खिलवाड़ में भी संकोच नहीं किया। संजय लीला का दावा मान लेते है। यह कि फ़िल्म में इतिहास को तोड़ा मरोड़ा नहीं गया है। लेकिन इसके साथ यह भी मानना होगा कि विवादित तथ्य भी जोड़े गए। इन्हीं को रिलीज होने से पहले तूल दिया गया।

भारत में महारानी पद्मिनी और अल्लाउद्दीन की अपनी अपनी अलग स्थापित छवि बनी हुई है। इतिहास की जानकारी न रखने वाले भी इस तथ्य से परिचित है। महारानी पद्मिनी अपने जौहर के लिये विख्यात है। सदियां बीतने के बाद भी इस रूप में ही उनका नाम अमर है। वहाँ उनका मंदिर है। प्रतिवर्ष वहां उनके नाम पर मेला लगता है।

उनके सम्मान से लोग भावनात्मक रूप से जुड़े हुए है। ऐसी महारानी जिसने अल्लाउद्दीन की परछाई से भी अपने को दूर रखने का संकल्प लिया था। जब कोई रास्ता नहीं बचा तो उन्होने जौहर को स्वीकार किया। इस तरह अपने शरीर का अंत किया। लेकिन अल्लाउद्दीन की निकृष्ट नियत को कामयाब नहीं होने दिया।

The mischief of Sanjay Leela Bhansali
The mischief of Sanjay Leela Bhansali

दूसरी बात यह कि वह गम्भीर प्रवत्ति की थी। उनको फ़िल्म में जिस प्रकार नाचते हुए दिखाया गया, वह भी बहुत आपत्ति जनक है। जो महारानी अपने स्वाभिमान, सम्मान, अस्मिता के लिए जान देने का जज्बा रखती थी, उन्हें इस प्रकार नाचते दिखाना संजय लीला की शरारत ही कही जाएगी। इस दृश्य को ही ट्रेलर के रूप में जारी करना ही फसाद की जड़ बन गया। शायद संजय लीला भंसाली (Sanjay Leela Bhansali) यही चाहते थे।

उन्होंने जन भावना को उकसाने का कार्य किया। पिछले उदाहरणों से उन्होने प्रेरणा ली होगी। जनभावना पर प्रहार करने वाले दृश्य फिल्मों में रखो, उनका प्रचार करो, लोग विरोध करेंगे। इससे फ़िल्म के प्रति दिलचस्पी बढ़ेगी। मतलब अपने मुनाफे के सामने जन भावना की कोई कीमत नहीं होती।

ऐसे प्रकरण में एक अन्य दिलचस्प बात होती है। विवाद के ऐसे सभी फिल्मी दृश्य हिन्दू मान्यतों से संबंधित रहते है। अन्य आस्थाओं पर प्रहार का मतलब वह समझते है। इसलिए ऐसा करने की गुस्ताखी नहीं कर सकते। हिन्दू आस्थाओं पर प्रहार करो,कोई विरोध करे तो असहिष्णुता का मुद्दा उठा दो। कहो कि देश मे असहिष्णुता बढ़ रही है, अभव्यक्ति की स्वतंत्रता को दबाया जा रहा है।

इन्हें कौन बताए कि अभव्यक्ति की स्वतंत्रता अमर्यादित नहीं हो सकती। आप किसी की भावना को ठेस पहुंचोगे तो उसे भी जबाब देने का मौका मिलेगा। इन स्थितियों से बचने के लिए अभव्यक्ति की स्वतंत्रता को समाज की दृष्टि से सीमित किया गया। पेशेवर कलाकर फीस लेकर नाच सकते है। लेकिन दृश्य किस पात्र पर फिल्माया जा रहा है, इसका ध्यान रखना चाहिए। इस विषय को व्यवसाय से ऊपर रखना चाहिए।

फ़िल्म के संबन्ध में दूसरी बात अलाउद्दीन की छवि से जुड़ी बताई गई। चर्चा हुई कि उसकी छवि अच्छी बताने का प्रयास किया गया। यदि ऐसा किया गया तो यह भी इतिहास से खिलवाड़ है। रानी पद्मिनी सम्मान की प्रतीक है। उसके विपरीत अलाउद्दीन क्रूर और विलासी आक्रांता था। इस छवि को बदलने का प्रयास अनुचित है। इस प्रकार का कार्य वामपंथी इतिहासकार सुनियोजित ढंग से करते रहे है। संभव है कि यह उसी प्रकार का प्रयास हो। इसके अलावा फिल्म के विरोध को राजपूतों तक सीमित बताना भी अनुचित है।

फ़िल्म के जो अंश चर्चा में आये है, उनसे भारतीय समाज को पीड़ा है। अपवाद स्वरूप ही लोग अभव्यक्ति की आजादी के नाम पर इन दृश्यों का समर्थन कर रहे है। इनमें फ़िल्म इंडस्ट्री के लोग आगे है। शशि थरूर जैसे कांग्रेसी नेता भी यही कह रहे है। उन्होंने कहा कि राजपूत राजाओं ने अंग्रेजों के सामने घुटने टेक दिए थे। लेकिन इस तर्क से महारानी पद्मिनी के सम्मान से कैसे जोड़ा जा सकता है। यह एक नारी के सम्मान से भी जुड़ा मसला है।

यह सन्तोष का विषय है कि फ़िल्म अब एक दिसम्बर की रिलीज नहीं होगी। सेंसर बोर्ड ने तकनीकी कारण से फ़िल्म को वापस भेज दिया है। इसी के साथ इस पर सुप्रीम कोर्ट भी विचार के लिए तैयार हो गया है। एक नई याचिका में फ़िल्म के आपत्तिजनक दृश्य हटाने की अपील की गई है। सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने अगले हफ्ते इस पर विचार की बात कही है।

याचिका में कहा गया कि क्या अभव्यक्ति की आजादी के तहत अनुच्छेद इक्कीस और तेरह का हनन किया जा सकता है। क्या संविधान मनोरंजन के नाम पर ऐतिहासिक महिला के चरित्र को बदनाम करने की इजाजत देता है। दूसरा बड़ा मुद्दा भी उठाया गया। कहा गया कि क्या मौजूदा सिनेमोटोग्राफी एक्ट 1952, किसी महान महिला की गरिमा आए इतिहास को पर्याप्त रूप से संरक्षित करता है।

पूरी फिल्म के बारे में विश्लेषण उसे देख कर हो सकता है। लेकिन जिन प्रसंगों से जनभावना आहत हुई है, उन्हें हटाना चाहिए। दूसरी बात यह कि की विरोध आंदोलन शांतिपूर्ण और संविधान के दायरे में होने चाहिए। तीसरी बात यह कि यह आंदोलन राजपूतों तक सीमित नहीं रहना चाहिए।

इससे भारतीय समाज की भावना आहत है। इसलिए समाज को एकजुटता भी दिखानी होगी। अन्यथा समाज विरोधी तत्व इसका भी फायदा उठाएंगे। वह विभिन्न वर्गों से जुड़ी बातों को गलत रूप में प्रचारित करेंगे। यह समाज को बांटने की चाल भी हो सकती है। इससे भी सावधान रहना चाहिए।

( लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं। )