देवेश शास्त्री

शिवसेना का मुखपत्र सवाल करता है कि JNU के छात्र ‘कन्हैया’ को हीरो किसने बनाया? केन्द्र की मोदी सरकार ने। निश्चित रूप से दिल्ली पुलिस केन्द्र के अधीन है, ऐसे में पर्याप्त साक्ष्य के अभाव में जमानत मिलना और क्षण-प्रतिक्षण गिरगिटी वृत्ति अपनाते हुए शाब्दिक रंग बदलते हुए कन्हैया का हीरो बनना इस बात का प्रमाण है कि प्रत्येक मिशन की सिद्धि के लिए शिक्षा-क्षेत्र को सुगम मार्ग माना गया है। तीन मिशन (1. लाल यानी माओवाद, 2. नीला यानी दलितवाद 3. हरा यानी अलगाववाद) का समन्वय रसायन विज्ञान से सूत्रवत् प्रभाव ने कन्हैया को हीरो बनाया। हां इसमें चैथे भगवा-मिशन के रिफ्लेक्शन की भी भूमिका है। क्योंकि सियासी विसात के पहले सोपान ‘‘छात्र-राजनीति’’ के माध्यम से वोटबैंक की सियासत में दलगत वक्तव्यों व गतिविधियों को कन्हैया को शिखर तक पहुंचाने का श्रेय है।
छात्र-जीवन ही राष्ट्र का भविष्य होता है, वैदिक काल में संस्कार के माध्यम से मानवीय गुणों को जाग्रत करने का मिशन ‘व्रह्मचर्य’ गुरु की पाठशालाओं की नैतिक मूल्यों की इमारत के रूप में रही, बौद्धकाल में नालंदा-तक्षशिला आदि शिक्षण संस्थाओं को वर्णाश्रम धर्म एवं बौद्ध दर्शन को मिशन के रूप में प्रयोग किया गया। मुगलकाल में मरहबी तालीम को मदरसों के माध्यम से लागु किया गया। ब्रिटिश काल में मैकाले के घोषणापत्र ने इन सबको ‘प्राच्य’ मानकर किनारे कर दिया, और मानव-संसाधन की कार्यशाला स्वरूप शिक्षण संस्थाओं को ‘अंगे्रजियत-मिशन’ को थोप दिया गया, जिसकी चपूट में भारत है। 1857 से 1947 ते 90 वर्षीय स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान शिक्षण संस्थाओं के जरिये ही ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ जंग हुई। संघ परिवार की ‘शिशु मंदिर’ योजना भी शिक्षा में जरिये संस्कार देने के साथ नैतिक मूल्यों के संरक्षण के मिशन के रूप में प्रस्तुत किया गया। स्वतंत्र भारत में ‘समग्र क्रान्ति’ व ‘इण्डिया अगेंस्ट करप्शन’ आदि मूमेंट में भी छात्रों की अहम भूमिका रही। सियासी-मिशन विभिन्न राजनैतिक दलों की छात्र इकाइयों के रूप में शिक्षण संस्थाओं में फैलाया गया, जिनके सहारे मानव संसाधन की कार्यशाला ‘‘नेता-निर्माण कार्यशाला हो गई। कुल मिलाकर कह सकते हैं कि ‘‘प्रत्येक मिशन की ‘सिद्धि’ का मार्ग है शिक्षा-क्षेत्र!
माओवाद के नक्शली निर्माण, अलगाववाद के आतंकी निर्माण सहित तमाम मिशनों का अलग-अलग उपक्रम जारी है, जेएनयू में 9 फरवरी को ‘सांस्कृतिक इवेंन्ट’ के नाम से अलगाववादी मूमेंट की योजना को जब जेएनयू रजिस्ट्रार ने रद्द किया तो कथित माओवादी छात्र कन्हैया की संदिग्ध भूमिका भी राष्ट्रद्रोह का प्रमाण नहीं माना जा सकता? भारत-विरोधी नारों को लगाने वालों से ज्यादा मूक प्रोत्साहन देने वाले ओैर उनका पक्ष लेने वाले दोषी हंै। कुल मिलाकर कन्हैया आज हीरो है, प. बंगाल-केरल सहित 4 राज्यों के आसन्न विधानसभा चुनाव में स्टार प्रचारक भी होगा। इस तरह वह अपनी पढ़ाई-लिखाई का ऐसा ‘‘सार्टीफिकेट’’ पा चुका है, जो बोर्ड व यूनीवर्सिटी के कागजी प्रमाणपत्रों की पोटली से काफी भारी भरकम है।